मेहलक़ा इक़बाल अंसारी, ब्यूरो चीफ, बुरहानपुर (मप्र), NIT:

टोंक (राजस्थान) की गलियों, कूचों और साहित्यिक जगत में आज एक गहरी ख़ामोशी छाई हुई है, क्योंकि प्रकृति के नियमानुसार टोंक के उर्दू और फ़ारसी साहित्य के एक महान स्तंभ, खुश फ़िक्र शायर साहिब ज़ादा शौकत अली खान (85) इस दुनिया को अलविदा कहकर अपने मालिके हकीकी की तरफ़ कुच कर चुके हैं। साहबज़ादा शौकत अली खान न केवल एक नामिग्रामी विद्वान थे, बल्कि राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के एक पहरेदार भी थे।
टोंक के नवाब परिवार में जन्मे शौकत अली खान साहब की साहित्य और इतिहास में रुचि बचपन से ही परिपक्व हुई। उनकी इस गहरी रुचि ने उन्हें टोंक में अरबी और फ़ारसी अनुसंधान केंद्र (अरबिक एंड पर्शियन इंस्टिट्यूट) की स्थापना की और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर का केंद्र बनाया।जो इन भाषाओं के विद्वानों और प्रेमियों के लिए बरगद के पेड़ के समान ज्ञान से लाभान्वित कर रहा है। उनके इस दिशा में किए गए प्रयास केवल अकादमिक नहीं थे, बल्कि यह एक जुनून था जिसने उन्हें पुराने युग की परंपराओं और ज्ञान को जीवित रखने की ओर प्रेरित किया। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से इंटरनेशनल हीरो इन लिटरेचर का अवार्ड प्राप्त करने वाले साहबज़ादा शौकत अली खान देश की एक ऐसी शख्सियत थे, जिन पर जितना नाज़ किया जाए कम है। जिनके कार्य को देखकर तत्कालीन भारतीय राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने खुद इनको नेशनल अवार्ड से नवाजे जाने का मुस्तहिक़ माना था। सन् 1986 में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह मौलाना अबुल कलाम अरबी फारसी शोध संस्थान देखने के लिए टोंक आए थे ।उसे समय उन्होंने यहां के संस्थापक निदेशक शौकत अली खान एवं संस्थान के बारे में लिखा था कि “मुझे खुशी है कि राजस्थान में ऐसे डायरेक्टर और ऐसा ईदारा (संस्थान) मौजूद है, जिस की वजह से राजस्थान अरबी फारसी दुनिया में जाना पहचाना जाता है। बहुत कम ऐसा होता है कि दोनों जबानों की एक साथ तरक्की व तरवीह कोई फरदे वाहिद करें। मुझे अज़ हद मसर्रत है कि एक ही शख्स ने जबानों अरबी व फारसी की तरक्की के लिए एक ईदारा बना दिया और इसको दुनिया में मुतारिफ (परिचित) करा दिया। इसके लिए इसके डायरेक्टर शौकत खान को यकीनन नेशनल अवार्ड मिलना चाहिए जिसके वह मुस्तहिक़ हैं। वहीं उनको यूनेस्को द्वारा आयोजित सेमिनार में भी अवार्ड मिल चुका है। उनकी शख्सियत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके जीवन कार्य को यदि बहुत संक्षिप्त में भी लिखा जाए तो एक किताब की शक्ल में सामने आ जाए। वह लेखक, इतिहासकार, अनुवादक, शेयर होने के साथ-साथ कई ऐसी खूबियां के मालिक थे, जो खूबियां दुनिया ए अदब में बहुत कम मिलती हैं।
मरहूम खान साहब के विद्वानिक प्रयासों ने एक व्यापक स्पेक्ट्रम को समेटा, परंतु उन्हें विशेष रूप से मिर्ज़ा ग़ालिब और टोंक के इतिहास पर किए गए उनके व्यापक कार्य के लिए जाना जाता है। ग़ालिब पर उनकी पुस्तक केवल एक विद्वानात्मक ग्रंथ नहीं थी, बल्कि एक प्रेम की कृति थी जिसने उस महान कवि के जीवन और कार्यों को नई रोशनी में दिखाया। उनके लेखन में गहन अनुसंधान और प्रगाढ़ अंतर्दृष्टि का संगम था, जिसने ग़ालिब की कविता के सार और उसके उर्दू साहित्य पर स्थायी प्रभाव को कैप्चर किया।
राजस्थान की साहित्यिक विरासत की रक्षा में उनके प्रयासों ने उनकी विरासत को और भी अमर बना दिया है। वे इतिहास के संरक्षक थे, जिन्होंने सुनिश्चित किया कि राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत समय के प्रवाह में खो न जाए। उनकी पहल और सहयोग ने इस विरासत को संरक्षित करने के महत्व को प्रमुखता से सामने लाया, न केवल विद्वानों के लिए बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी। उन्होंने अनेक अरबी और फारसी पुस्तकों का उर्दू में अनुवाद किया। वह एक इल्म दोस्त और अदब नवाज़ शख्सियत थे। उन्हें फन ए खत्ताती (केलीग्राफी) से खास लगाव था। उनकी एहम पुस्तकों में इस्लामी हिंद में फन ए खत्ताती: इम्तियाज़ात और खुसुसियात और क़सरे इल्म टोंक के कुतुब खाने उनके नवादरात खास तौर पर काबिले जिक्र हैं।
उनके निधन से भारत ने अपना एक विद्वान, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक प्रेमी, एक महान शिक्षक और एक बड़े स्कॉलर को खो दिया है। उनकी विरासत, उनके शोध और उनकी पुस्तकें, हमेशा हमारे बीच उनकी उपस्थिति का एहसास दिलाते रहेंगी। उनका जाना न केवल टोंक के लिए बल्कि संपूर्ण भारतीय साहित्य जगत के लिए एक अपूर्ण क्षति है। अल्लाह करीम मरहूम को जन्नतुल फिरदौस में आला से आला मक़ाम अता फरमाए। उनकी बक्शीश फरमाए। उनकी मगफिरत फरमाए और उनको अपनी जवारे रहमत में आला मुकाम अता फरमाए, आमीन।

