नरेंद्र इंगले, ब्यूरो चीफ, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:
14 हजार हेक्टेयर में फैले जामनेर वनविभाग के घने जंगलों में घास भक्षी पशुओं के शिकार का मामला प्रकाश में आया है। जामनेर के नागण चौकी परिसर में कुछ सजग युवकों की सतर्कता से यह मामला उजागर हो सका है। 11 नवंबर के दिन समरोद वनखंड के जंगलों में शिकार की मंशा से पधारे शार्प शूटर्स को वनविभाग ने हथियारों के साथ गिरफ्तार किया। हिरासत में लिए गए आरोपी की पहचान धुलिया निवासी अब्दुल मोहम्मद नबी के रूप में की गई है। इस रैकेट में शामिल अन्य दो लोग फरार होने में कामयाब हो गए हैं। कार्रवाई के बाद वनविभाग ने पुलिस प्रशासन के साथ साझा पत्रकार परिषद का आयोजन कर वनविभाग के शौर्य का महिमामंडन किया। इस ब्रिफ्फिंग में वन अधिकारी समाधान पाटिल, पुलिस प्रमुख प्रताप इंगले समेत दोनों विभागों के खास कर वनविभाग के जुझारू कर्मीगण चेहरे पर मुस्कान लिए कैमरों को फेस करते नजर आए। जामनेर के जंगलों में घास भक्षी पशुओं नीलगाय, हिरण, खरगोश समेत अन्य जानवरों की शिकार करने की गतिविधिया कोई नई बात नहीं है। इस मुहिम में जिले के बाहरी तत्वों की सीधी सहभगिता स्पष्ट होती रही है। कुछ सालों पहले मुंबई के गोल्ड मेडलिस्ट शूटर के नेतृत्व में इसी तरह की वारदात को अंजाम दिया गया था तब प्रशासन ने इस गिरोह को रंगेहाथ गिरफ्तार कर मामला दर्ज किया था। किसी समय एक वक्त ऐसा भी था जब शिकार को प्रतिष्ठा समझकर रात रातभर जंगलों की खाक छानने वाले सरकारी मुलाज़िम खुलेआम शिकार पर निकला करते थे फिर कानूनों में तब्दीलियां आईं और इस प्रतिष्ठा को आइना दिखाया गया। वाघुर कांग समेत अन्य बांधों मे पर्याप्त जल भंडारण के चलते जामनेर मुक्ताईनगर फारेस्ट रेंज के जंगलों में घास भक्षी पशुओं के शिकार का सिलसिला कई सालों से जारी है। सूत्रों के मुताबिक शिकार में मृतक जानवरों का मांस जिला मुख्यालयों के निजी होटलों तक पहुंचाया जाता है। अब शिकार जैसे गैरकानूनी कारनामो में लिप्त तत्वों की हरकते वनविभाग के जमीनी महकमे से छिपना बिल्कुल नामुमकिन बात है। समय समय पर पर्यावरण प्रेमी नागरिकों द्वारा वनविभाग के कर्तव्यदक्ष कर्मियों को शिकार से संबंधित सूचनाओं से अवगत कराया जाता रहा है फिर भी वनविभाग ने ना कभी कॉम्बिंग आपरेशन चलाया और ना हि कोई ठोस उपाय किए बस मोबाइल स्कॉट के भरोसे सतर्कता की नोटंकी की गयी। किसी सचेत की ओर से जंगलों में हुए अपराधों को लेकर सोशल मीडिया पर कुछ विचारों को अभिव्यक्त किया गया तो उसे वनक़ानूनों का डर दिखाकर धमकाया गया यह भी एक सच्चाई है।
