शादी-ब्याह को लेकर अब कायमखानी समाज भी होने लगा है सीमित, परिवारजन रिश्ते अलग अलग गांव की बजाये गांव की गांव में करने को देने लगे हैं तरजीह | New India Times

अशफ़ाक़ क़ायमखानी, सीकर/जयपुर (राजस्थान), NIT:

हालांकि राजस्थान में राजपूत से मुस्लिम बने लोगों के समुह को कायमखानी बिरादरी के नाम से जाना जाता है। अधीकांश तौर पर देहाती परिवेष में रहने वाली इस बिरादरी में विभिन्न गोत्र पाई जाती है। इनमें आज भी पहले के मुकाबले चाहे कम लेकिन सत्यावनी की महिलाएं राजपूत महिलाओं की तरह कपड़े पहनती हैं। जबकि शेखावाटी की महिलाएं शादी-ब्याह को छोड़कर सलवार सूट ही अधिक पहनती है। पुरुषों ने धोती कुर्ता व साफे की जगह पेंट-शर्ट्स व पायजामा-चोला बहुतायत में पहनने लगे हैं। शादियों में आज भी अधिकांश जगह राजपूती परम्पराओं व प्रथाओं का चलन देखा जाता है।

मुख्य रुप से शेखावाटी जनपद व स्त्यावनी एवं मारवाड़-मेवाड़ – बीकानेर जनपद मे निवास करने वाली कायमखानी बिरादरी में कुछ गोत्र परम्परा अनुसार आज भी अपने गोत्र में शादी नहीं करते हैं। जबकि अनेक गोत्र अब जाकर अपनी गोत्र में शादी करने लगे हैं। पहले गोत्र व रिश्तो के सही मैच होने के लिये एक दुसरे गावं, शहर व ज़िलों मे रिस्ते होकर शादियां हुवा करती थी। जिसमें गांवों व शहरों में रिस्तेदारी होने के विभिन्न अवसरों पर रिस्तेदारों का आना जाना होता था। इससे आपस में फैलाव व दायरा बढ़ा हुवा रहता था।

समय बदलने के साथ परिस्थितियों में बदलाव आने से बिरादरी में पहले कम तादाद में गावं की गांव व कस्बे की कस्बे में शादियां होने चलन पड़ा। देखते देखते नजदीक में ही शादियां होने का चलन अब परवान चढ़ने लगा है। उदाहरण के तौर पर डीडवाना का बेरी गावं, सीकर क्षेत्र का किरडोली- कासली-बेसवा (लगते पांच-सात गावं) व झूंझुनू का नुआ गाव सहित बडी तादाद मे अनेक गाव ऐसे है जहां गावं की गावं मे बहुतायत मे शादियां होने लगी है। कस्बो मे डीडवाना- लाडनू- सुजानगढ़-चूरु- फतेहपुर व कुछ अन्य नाम उदाहरण के लिये जा सकते है। जहां कस्बे दर कस्बे मे शादियां बहुतायत मे होने लगी है।

बिरादरी में कुछ लोगों को छोड़कर बहुतायत में परिवारजन कम से कम अपनी बेटी का रिस्ता गावं की गाव व कस्बे की कस्बे मे करने को तरजीह देने लगे है। यानि अधीकांश वालदैन की तमन्ना रहने लगी है कि उनकी बेटी नजदीक से नजदीक रहे। इस तरह की शादियों मे व उसके बाद काफी खर्चो मे कमी जरुर आती होगी। लेकिन आपसी मैल मिलाप एक सीमित दायरे तक ही रहने लगता है। जब शादियां अलग अलग गाव व कस्बों में होती तो रिस्तेदारी का दायरा लम्बा चोड़ा होता था।

इस तरह नजदीक में शादियां करने के लिये धार्मिक व वैज्ञानिक तौर पर आंकने में कतई चेष्टा नहीं कर रहा हुं। लेकिन दायरा बढे तो चोईसेज व आपसी मैलजोल अधिक होने की सम्भावना रहती है। कायमखानी बिरादरी की मैलमिलाप व तरक्की की राह खोजने वाली संस्था “राजस्थान कायमखानी महासभा” का भादरा अधिवेशन के बाद मृत हालत मे चले जाना इसका प्रमुख कारण रहा है। महासभा के कारण विभिन्न तरह की मीटिंग व अधिवेशन के बहाने राज्य भर एवं राज्य से बाहर दैश विदेश मे रहने वाले कायमखानी सरदार एक जाजम पर बैठकर विभिन्न मुद्दों पर विचार विमर्श करके राय अमल बनाकर उस कार्य योजना पर काम करते थे। विभिन्न जगह जगह से आने वाले कायमखानी आपस में इकट्ठा बैठते तो जानकारी एक दुसरे का जहन खोलने का दायरा विशाल रुप धारण करता था। अब कुछ सक्रिय लोगो को ही मालूम है कि मारवाड़-मेवाड़ -शेखावाटी -बीकाणा सहित राज्य व राज्य के बाहर कायमखानी किस तरह किस हालत एवं मजबूती- मुश्किल व खुशी मे रह रहा है। लेकिन अधिकांश को इसकी समय पर वास्तविक जानकारी तक नही हो पाती है। तरक्की व मेल-मिलाप ना होने से आपस में समाजी-आर्थिक व शैक्षणिक उत्थान की तरक्की से आदान प्रदान नहीं हो पाते हैं।


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