रहीम शेरानी हिन्दुस्तानी, ब्यूरो चीफ, झाबुआ (मप्र), NIT:

हिंद में रहकर जो तेरा एहसान भुला दे ख्वाजा, वो न मुस्लिम है न मोमिन है, हैवान है वो इंसान नहीं। बेटी को समझते हैं मुसीबत की वजह, वो न मुस्लिम है न मोमिन है।।
राजस्थान के कपासन से इंटरनेशनल कव्वाल शब्बीर सदाकत साबरी ने जब ये शेर पढ़ा तो आयोजन स्थल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
खुशनुमा सुहाने मौसम के साथ, इत्र की खुशबु की महक के बीच सुर और ताल की से संगत मिलाती कव्वाल पार्टी, सूफी संतों और हर कलाम पर कव्वाल पर नोटों की बारिश करते बाहर से आए ख्वाजा के दीवानों और नबी से मोहब्बत करने वाले देर रात तक मौजूद रहे।
नगर के हजरत दातार ओढ़ी वाले दादा रहमतुल्लाह अलैह दादाजी का 20 वां सालाना उर्स मुबारक कव्वाली का आयोजन रखा गया।
रात में सरकार के दरबार में महफिल ए समां अपने शबाब पर रही।
पहले रतलाम जिले की जावेद सरफराज चिश्ती कव्वाल पार्टी ने मंच संभाला। इसके बाद कपासन के शब्बीर सदाकत साबरी ने मंच संभालकर अपने कलाम पेश किए। उन्होंने ऐसा माहौल खड़ा कर दिया कि हर आशिके रसूल झूम उठा। उन्होंने नबी के नाम कलाम सुनाते हुए कहा फर्क है कि हम हिंदुस्तानी है। इसके साथ ही हसनेन करीमेन हमारे, दिलबरे बू तराबे ख्वाजा, ये रिश्ता अबू तालिब का है, खाके तेबा आंखों से लगाई जाए आदि कलाम पेश किए। जिस पर बाहर से आए मेहमानों ने खूब दाद दी।
वडोदरा, झाबुआ, धार शहरों के साथ कई शहरों के श्रद्धालु पहुंचे
रात करीब 3 बजे के बाद गजलों का दौर शुरू हुआ। जिसमें सदाकत साबरी से भरपूर गजल पेश कर श्रोताओं का मनोरंजन किया। कार्यक्रम का संचालन रियाज भाई ने किया। कव्वाली की महफिल सुनने के लिए झाबुआ, राणापुर, भाबरा, थांदला, रतलाम,ब काछी बड़ोदा, धार, बदनावर, बड़नगर, कुशलगढ़, मेघनगर, सरदारपुर सहित कई जगहों से श्रद्धालु पहुंचे। महफिल ए सिमां में कई सूफी संत भी शामिल हुए जिन्होंने कव्वाली प्रोग्राम की रौनक बड़ाई । सदर सलीम शेख और उपसदर अमजद लाला ने सभी नगरजनों और श्रद्धालुओं का सफल आयोजन के लिए आभार माना।
कैसा जादू तूने निगाहे यार तूने किया इस पर नजराना पेश किया
हजरत ओढ़ी वाले दातार रेअ के सालाना उर्स का समापन शनिवार को महफिल-ए-रंग के साथ हुआ। आस्ताने औलिया के बाहर स्थित महफिल खाने में कुल की महफिल हुई। सुबह महफिल खाने में साढ़े 9 बजे रंग की महफिल शुरू इसमें रतलाम से आए जावेद चिश्ती ने कई कलाम पढ़े। कार्यक्रम में कव्वाली गाने के दौरान एक-एक कलाम पर बड़ी संख्या में लोगों ने नजराना पेश किया। उन्होंने ये कैसा जादू तूने निगाहे यार किया, कलाम पेश किया तो उपस्थित लोगों की आंखों से पानी बह निकला। सुबह 11 बजे हजरत अमीर खुसरो द्वारा लिखित आज रंग है री मां रंग है, से कुल की महफिल का समापन हुआ। उर्स के दौरान आज रंग है री सखी ओढ़ी वाले बाबा के घर आज रंग है, आओ चिश्ती संग खेलें होली दातार के संग, जैसे कलाम कव्वाल ने पेश की तो पूरा शामियाना इत्र व गुलाब जल की खुशबू से महक उठा। आस्ताने में कुल की रस्म हुई जिसमें फातेहा पढ़ी जाकर मुल्क में अमन चैन और खुशहाली की दुआ की गई।
केसरिया साफे से सजी महफिल
रंग की इस महफिल में हर किसी के सिर पर केसरिया साफे नजर आए। इसी रंगारंग महफिल में जावेद चिश्ती ने अपनी कव्वाली पेश की, जिसे समाजजनों ने खूब सराहा। अंत में मेला बिछड़ो ही जाए, दातार तोरा मेला बिछड़ो ही जाए पढ़कर रंग की महफिल का समापन हुआ। सर्व समाज उर्स कमेटी के कार्यकर्ताओं ने बताया कि कमेटी की ओर से लंगर-ए-आम शुद्ध सात्विक भंडारे का आयोजन किया गया। लंगर में श्रद्धालुओं ने बड़-चढकर हिस्सा लिया। उर्स कमेटी ने प्रशासन सहित लोगों का धार्मिक आयोजन को सफल बनाने के लिए आभार माना।
