अरशद आब्दी, झांसी (यूपी), NIT; 
लेखक: सैय्यद शहंशाह हैदर आब्दी
प्रधानमंत्री जी, मुसलमान लड़कियों को सिर्फ़ सलमा-सितारा से सजा ग़रारा-शरारा पसंद नहीं है, वे शलवार भी पहनती हैं और जींस भी, साड़ी भी पहनती हैं और पैंट भी। वे सिर्फ़ लखनवी, भोपाली और हैदराबादी अंदाज़ में आदाब अर्ज़ करती कोई बेगम/ख़ातून नहीं हैं बल्कि हाथ जोड़कर नमस्ते से अभिवादन भी करती हैं।
वे आँचल को परचम बना कर मोर्चा संभालती हैं। खेतों में काम करने वाली मेहनतकश हैं तो दुनिया के स्टेज पर झंडे लहराती दिमाग़ भी हैं। तक़रीबन हर क्षेत्र में वो उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। इसलिए, मुसलमान स्त्रियों का मुद्दा सिर्फ़ तलाक़, हलाला, बहुविवाह या शरिया अदालत क़तई नहीं है। उन्हें भी आगे बढ़ने के लिए पढ़ाई और रोज़गार की ज़रूरत है। घर के अंदर और बाहर हिंसा से आज़ाद माहौल की ज़रूरत है।
यहां यह स्पष्ट करना भी ज़रूरी है कि एक बार में तीन तलाक़ मुसलमानों के 73 फिरक़ो में से सिर्फ़ एक फ़िरक़े में रायज है। उसमें भी मुश्किल से 1% से भी कम महिलाएं शायद इससे पीड़ित हों, लेकिन उस फ़िरक़े ने भी अदालत का फैसला सहर्ष स्वीकार किया। फिर भी इस पर सियासत जारी है, अफवाहों के ज़रिए माहौल ऐसा बनाया जा रहा है कि जैसे कि मुस्लिम महिलाओं का बहुमत इस समस्या से पीड़ित है।
इन मुस्लिम महिलाओं से कई गुना ज़्यादा संख्या उन महिलाओं और उनसे पैदा बच्चों की है, जो गुमनामी के अंधेरे में गुम हैं। जिन्हें पति और पिता का नाम सार्वजनिक रूप से सिर्फ़ इसलिए नहीं मिलता कि वे पति की दूसरी बीबी और उससे पैदा बच्चे हैं। वे पत्नी नहीं, अपनी इन बहन बेटियों से क्षमा याचना के साथ, हाथ नहीं रूह कांपती है यह शब्द लिखने में, लेकिन यह दोग़ले समाज की हक़ीक़त है, रखैल (Kept) कहलाती हैं।
उच्चतम न्यायालय तक जाकर कितने बच्चे, डी.एन.ए. टेस्ट के बाद, पिता का नाम पा सकते हैं और मां की मांग में सिंदूर भरवा सकते हैं?
कोई महिला संगठन इनकी आवाज़ बुलंद क्यों नहीं करता? महिला हितैषी यह सरकार इनको इनका हक़ क्यों नहीं दिला रही? क्या यह उन महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार नहीं? फिर तथाकथित राष्ट्रवादी व्यक्ति, संगठन और सरकार इनके कल्याण के लिए कार्य क्यों नहीं कर रहे? क्या यह भी एक प्रकार का कठमुल्लापन नहीं?
मुसलमानों में अगर दूसरी बीवी है तो बीवी है,…….नहीं। उसका सामाजिक सम्मान है। उसे पति का और उसके बच्चों को बाप का नाम भी मिलेगा और विरासत भी।
इस लिऐ सबसे पहले अपनी पत्नी की चिंता कीजिए, जिसे आपने गुज़ारा भत्ता आज तक दिया भी कि नहीं।
फिर फिक्र कीजिए अपने समाज की उन बेसहारा पीड़ित और शोषित महिलाओं की जिन्हें आजतक पति का नाम नहीं मिला और जिनके बच्चे आज भी गुमनामी के अंधेरे में गुम हैं और जिनकी संख्या तीन तलाक़ से पीड़ित महिलाओं से कई गुना ज़्यादा है। करवाईये सर्वे और बनाईये क़ानून, तब समझें कि आपको आपकी पार्टी को और आपके मातृ संगठन को वास्तव में बेसहारा और शोषित पीड़ित महिलाओं और बच्चों की ज़्यादा फिक्र है।
एक नज़र डालिये “नियोग प्रथा” पर। क्या है यह? घोषित कीजिए, इसे घिनौना अपराध।
वरना बंद कीजिये यह ढ़कोसले बाज़ी और धर्म आधारित साम्प्रदायिक राजनीति।
सैय्यद शहंशाह हैदर आब्दी,समाजवादी चिंतक, झांसी
