हज़रत अली की शहादत पर मजलिसे अज़ा और ताबूत की ज़ियारत, मासूम अकबर आब्दी के साथ अन्य लोगों ने हजरत अली को दी श्रद्धांजलि

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अरशद आब्दी, ब्यूरो चीफ, झांसी (यूपी), NIT:

अनजुमन-ए-अलविया के तत्वाधान में रसूले खुदा मोहम्मद मुस्तफा के उत्तराधिकारी हज़रत अली की शहादत की याद में एक “मजलिस-ए-अज़ा” मेवाती पुरा झांसी में स्थित ‘बाबा के कोठे’ के नाम से प्रसिध्द इमाम बारगाह फतेह अली आब्दी मरहूम में आयोजित की गई। जिसमें “कोरोना” के कारण शासन के वर्तमान सभी नियमों का पालन करते हुये मौलाना सैयद शाने हैदर ज़ैदी के संरक्षण में मात्र चार मोमिनों सैयद शहनशाह हैदर आब्दी पूर्वाध्यक्ष, हाजी तक़ी हसन, अता अब्बास आब्दी –महामंत्री और सैयद ताज अब्बास आब्दी ने हिस्सा लिया और बाद मजलिस-ए-अज़ा हज़रत अली के ताबूत की ज़ियारत कराई गई। हज़रत अली की शहादत की मजलिसे अज़ा और ताबूत के संस्थापक मरहूम सैयद फतेह अली आब्दी और संगठन के अन्य पूर्व पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को भी श्रृध्दांजली दी गई।

संचालन करते हुये सैयद शहनशाह हैदर आब्दी ने कहा,” इतिहास में ऐसे कम ही लोग देखे जा सकते हैं जिनका अस्तित्व सर्वकालिक हो और समय उनकी यादों को मिटाने में विफल रहा हो। लेबनान के प्रख्यात लेखक ख़लील जिबरान, यद्यपि ईसाई हैं, किंतु हज़रत अली अलैहिस्सलाम के श्रद्धालुओं में से एक हैं। वे उनके बारे में लिखते हैं।,” मेरे विचार में हज़रत अली केवल अपने समय और काल से विशेष नहीं थे बल्कि वे ऐसे व्यक्ति हैं जिनका अस्तित्व सर्वकालिक है।। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ऐसी हस्ती हैं जिनके अस्तित्व के गुणों और पवित्र प्रवृत्ति ने उन्हें सभी मानवीय आयामों से श्रेष्ठ बना कर हर समय व पीढ़ी के समक्ष प्रस्तुत किया है।“

हुज्जातुल इस्लाम मौलाना जनाब सैयद फ़रमान अली आब्दी ने कहा,” इस्लाम, प्रेम शांति और भाई चारे का मज़हब है। चन्द लोगों को छोडकर सभी मुसलमान प्रेम शांति और भाई चारे के साथ रहना चाहते हैं। यही चन्द लोग इस्लाम का नक़ाब पहनकर रसूले खुदा के ज़माने में भी मुखाफलत करते रहे। रसूले खुदा की शहादत के बाद यह लोग खुल कर दहशतगर्द (आतंकवादी) हो गये। 19 रमज़ान 40 हिजरी को कूफे की मस्जिद में रसूले खुदा के वास्तविक उत्तराधिकारी हज़रत अली पर सुबह की नमाज़ पढते हुये सजदे में ज़हर की बुझी तलवार से अब्दुलरहमान इब्ने मुल्जिम का क़ातिलाना हमला इस्लाम के नाम पर पहला बडा आतंकी हमला था, जिससे 21 रमज़ान 40 हिजरी को हज़रत अली की शहादत हुई। आज भी इसी विचारधारा के लोग इस्लाम के नाम पर दहशत गर्दी कर इंसानियत और इस्लाम को बदनाम कर रहे हैं। हमने इनका कल भी सशक्त विरोध किया था, हम आज भी इनके सशक्त विरोधी हैं। इन बुज़दिलों के विरुध्द हमारा सशक्त संघर्ष और क़ुर्बानियां कल भी इतिहास में दर्ज थीं आज भी दर्ज हो रही हैं। हम इन्हें नेस्तोनाबूद कर ही चैन की सांस लेंगे।“

संरक्षक हुज्जातुल इस्लाम मौलाना जनाब सैयद शाने हैदर ज़ैदी ने हज़रत अली की ज़िन्दगी पर प्रकाश डालते हुये कहा कि “एहसास ज़िन्दा है तो इंसान ज़िन्दा है अन्यथा मुर्दा”। हज़ारों लोग क़ब्रिस्तानों में सोकर भी ज़िन्दा हैं जबकि हज़ारों लोग ऐसे भी हैं जो आलीशान महलों में रहकर भी मुर्दा हैं। ख़ुदा ने हमें ख़िदमते ख़ल्क़ के लिये पैदा किया है, दूसरों का दुखदर्द बांटोगे तो ज़िन्दा होने का सुबूत दोगे, मुल्क और पडोसी से मोहब्बत करोगे तो ज़िन्दा होने का सुबूत दोगे। नेक काम करो ताकि मौत के बाद भी ज़िन्दा रहो। वक़्त के बादशाह होने के बाद भी हज़रत अली ऐसे ही थे। वे तपती दोपहर में खजूरों के बागों की सिंचाई करते थे और उससे प्राप्त होने वाले धन को दरिद्रों और वंचितों पर ख़र्च कर देते थे। वे सर्वकालिक योग्य शासक थे। उनका स्पष्ट निर्देश था कि जनता में किसी भी कारण से कहीं भी कोई भेदभाव ना किया जाये। हज़रत अली को सच्ची श्रृध्दांजली यही होगी कि हम बिना भेदभाव के दीन दुखी, परेशान हाल, बीमार और कमज़ोर मानव की सेवा करें और समाज एवं मुल्क में अमन, प्रेम और आपसी भाईचारगी के लिये काम करें।

इसके पश्चात मौलाना से हज़रत अली के मसायब पढे तो श्रृध्दालुओं की आंखों से बरबस आंसू निकल पडे और इसी ग़मगीन माहौल में “मौला के ताबूत की ज़ियारत कराई गई। “इब्ने मुल्जिम ने हैदर को मारा – रोज़ादारो क़यामत के दिन है” नौहा पढा गया और नौहा-ओ-मातम हुआ।

शासन के वर्तमान सभी नियमों का सख़्ती से पालन करते हुये बाद में श्रृध्दालु महिला पुरुषॉं ने पांच – पांच की संख्या में निर्धारित दूरी बनाकर ताबूत पर मुरादे मांगी और मन्नतें बढाई। अंत में सभी धर्मगुरुओं ने मिलकर शांति पाठ किया और सर्वशक्तिमान से सबके लिये सुख, समृध्दि, शांति और “कोरोना” और अन्य संकटों से सफलता पूर्वक मुक्ति की प्रार्थना की।

आभार जनाब सैयद तक़ी आब्दी और सैयद अता अब्बास आबदी ने ज्ञापित किया ।

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