जमीअत उलमा मप्र द्वारा एनआरसी एवं सीएए के विरोध में भोपाल सहित प्रदेशभर में चलाया जा रहा है हस्ताक्षर अभियान

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अबरार अहमद खान/मुकीज खान, भोपाल (मप्र), NIT:

राजधानी भोपाल में सीएए-एनआरसी को लेकर सत्याग्रह, हस्ताक्षर अभियान और ज्ञापन देने का सिलसिला लगातार जारी है।16 दिनों से इक़बाल मैदान में जारी सत्याग्रह में हर शाम हजारों लोग जुटकर अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं।

जमीअत उलमा मध्य प्रदेश द्वारा प्रदेश अध्यक्ष हाजी मोहम्मद हारून के मार्गदर्शन में एनआरसी एवं सीएए के विरोध में भोपाल सहित प्रदेशभर में हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है। जिसमें जमीअत की टीम शहर के विभिन्न इलाकों में जाकर मोहल्लों और दुकानों में लोगां से हस्ताक्षर करवा रहे हैं। इस बीच कार्यकर्ताआं द्वारा लोगों को कानून संशोधन से होने वाले बदलाव और नुकसान की जानकारी दी जा रही है।

हस्ताक्षर अभियान की अगुवाई कर रहे हाजी मोहम्मद इमरान ने NIT सावांददाता को बताया कि अब तक सूची के हजारों हस्ताक्षर हो चुके हैं। अभियान सवा लाख हस्ताक्षर पूरे होने तक चलाया जाएगा। उन्होंने कहा कि भोपाल में जमीअत उलमा द्वारा कानून संशोधन के विरोध में हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है जिसके पूरा होने के बाद ज्ञापन के साथ राष्ट्रपति को भेजा जाएगा। इस ज्ञापन के माध्यम से इस काले क़ानून के वापसी की मांग की जाएगी। गुरूवार को शहर में कई जगह हस्ताक्षर अभियान चलाया गया। हस्ताक्षर अभियान की टीम में मुजाहिद मोहम्मद खान, मुफ्ती मोहम्मद राफे, हाफिज ईस्माइल बैग, मोहम्मद फरहान, हनीफ अय्यूबी, मोहम्मद यासिर, मोहम्मद कलीम एडवोकेट आदि शामिल हैं।
वहीं सत्याग्रह का 16वां दिन पूरा हो चुका है।

एक जनवरी से राजधानी के इकबाल मैदान में जारी सत्याग्रह में हर दिन नए-नए लोगों को शामिल कर एनआरसी-सीएए के बारे में उनके विचारों से लोगों को अवगत कराया जा रहा है। इस बीच अब तक कई बुद्धिजीवी, शायर, शायरात, स्वयंसेवी संस्थाओं से जुड़े लोग, डॉक्टर्स आदि अपनी मौजूदगी यहां दर्ज करवा चुके हैं। इसी कड़ी में इस मंच पर सत्ता बनाम पत्रकारिता विषय पर बात की गई। इस दौरान सत्याग्रह स्थल पर भोपाल के अलावा देशभर के कई वरिष्ठ पत्रकार मौजूद थे। पत्रकारों ने अपनी बात में संशोधन को संविधान विरोधी और सरकार का मनमानी भरा फैसला बताया। उन्होंने देशभर मेंं हो रहे आंदोलन को इस कानून से नाराज लोगों की तादाद से जोड़ा। पत्रकारों ने यह भी कहा कि देश के इतिहास का यह पहला कानून है, जिसको लागू करने के लिए सरकार को लोगों के पास जाकर इसकी समझाईश देना पड़ रही है।

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