पारणा महोत्सव व अभिनंदन समारोह हुआ आयोजित,<br>शरीर को तपाने पर ही आत्मा ऊर्जावान बनती है: मुनिराज चंद्र यश विजय जी म.सा | New India Times

रहीम शेरानी हिन्दुस्तानी/पंकज बडोला, झाबुआ (मप्र), NIT:


महातपस्वी महायशस्वी आचार्य श्री महाश्रमण के सुश्रावक स्वर्गीय पूनमचंद कोठारी के सुपौत्र कल्प कोठारी द्वारा 16 उपवास की कठोर तपस्या की गई।
जिसका पारणा महोत्सव व अभिनंदन समारोह का आयोजन स्थानीय अंबा पैलेस पर किया गया। पारणा महोत्सव विशेष रूप से मुनिप्रवर चंद्रयश विजय जी व मुनि जिनभद्र जी के सानिध्य में संपन्न हुआ। कल्प कोठारी को धार्मिक संस्कार अपनी दादी व माता-पिता से प्राप्त हुए।

कल्प कोठारी ने 9 वर्ष की आयु में सन 2020 में बियासने से वर्षीतप की तपस्या की, दसवें वर्ष में 2021 में 9 उपवास की तपस्या की 11 वर्ष की उम्र याने 2022 में 11 उपवास की तपस्या की व 12 वर्ष की उम्र में वर्तमान में 2023 16 उपवास की तपस्या की। इसके अलावा कई एकासान, बियासन व आयंबिल तप भी किए। वही दादी सुशीला कोठारी का सातवां वर्षिता गतिमान है।
कल्प की माता सोनिया कोठारी ने भी वर्षीतप किया व कई उपवास, एकासन व आयंबिल तप भी किए।

पिता वैभव कोठारी द्वारा भी वर्षीतप किया गया। 8 व 9 उपवास की तपस्या भी की गई व ओलीजी तप आराधना भी की। वही करीब 90 दिनों से वैभव द्वारा एकासान तप लगातार किए जा रहे हैं। वही कल्प की बड़ीमम्मी ने पूर्व मे मासक्षमण व सिद्धि तप की तपस्या पूर्ण की है इस प्रकार यह पूरा परिवार धार्मिक संस्कारों से जुड़ा हुआ 27 सितंबर को शाम 8:00 बजे स्थानीय अंबा पैलेस पर कल्प कोठरी के 16 उपवास की तपस्या के उपलक्ष में चोबीसी का आयोजन किया गया। जिसमें जैन धर्म संप्रदाय की विभिन्न महिला मंडलों ने गीत प्रस्तुति दी। उसके पश्चात भादुडी तेरस होने पर तेरापंथ समाज द्वारा धर्म संघ के प्रवर्तक आचार्य श्री भिक्षु के 221 में चर महोत्सव के अवसर पर भिक्षु भक्ति का आयोजन किया गया। जिसमें आचार्य श्री भिक्षु का जाप किया गया व विभिन्न गीतों का संगान किया गया। गीतों के माध्यम से तपस्वी के तप की अनुमोदना भी की गई। 28 सितंबर को सुबह 9:30 बजे अंबा पैलेस पर पारणा महोत्सव व अभिनंदन समारोह प्रारंभ हुआ।

सर्वप्रथम बालिका कस्ती बोराणा , रिद्धि व सिद्धि कोठारी ने नृत्य प्रस्तुति देखकर तप के महत्व को दर्शाने का प्रयास किया। पश्चात मनीषा बोराणा व मोनिका संघवी व टीम ने नृत्य की प्रस्तुति देकर तपस्वी के ताप की अनुमोदना की। सुबह करीब 10:00 बजे मुनिराज चंद्रयशविजय जी व मुनि जिन भद्र जी का आगमन हुआ व कार्यक्रम का विधिवत प्रारंभ हुआ। सर्वप्रथम मुनिप्रवर द्वारा प्रार्थना के माध्यम से देव आराधना की गई।

उसके पश्चात मुनि चंद्रयश विजय जी ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि यह 16 उपवास कल्प कोठारी के मन की मजबूती का छोटा सा उदाहरण है तपस्या के माध्यम से मन मजबूत होता है शरीर भी छोटा होने के बावजूद आप जिस तपस्या को शरीर से गुजरते हुए देखते हैं तो कल्प ने 16 उपवास कर मन की मजबूती का एहसास कराया हैं अपितु अपने सहनशील होने का परिचय भी दिया हैं ।

मुनि श्री ने आगे यह भी कहा कि तपस्या के माध्यम से भी जिन शासन मे आत्मा की शुद्धि कही गई है।

तप नवकारसी भी है तप उपवास भी है तप एकासान भी है सिद्धि तप भी है 16 उपवास भी तप हैं । हर वह आत्मा महानता की श्रेणी में आती है जिनको तप करने का भाव होता है तप करने का भाव किसको होता है जिनको अपनी आत्मा की कल्याण की चिंता है हमारे अनादि काल में जैन सिद्धांतों में तप का बड़ा महत्व है चार प्रकार के धर्म में दान, शील, तप और जप मैं तप का विशेष स्थान है नवपद में भी नौवापद तप है उन्होंने उदाहरण के माध्यम से समझाया जैसे एक ट्रेन में सबसे पहले इंजन होता है और आखरी में गार्ड का डिब्बा होता हैं जो लाल और हरी झंडिया दिखता है पहले नंबर इंजन को आखरी डिब्बे से ग्रीन सिग्नल मिलने पर ही इंजन स्टार्ट होता है तथा गार्ड अपने कर्तव्य का निर्वहन कर ट्रेन को आगे बढ़ाता है ट्रेन के पहले स्थान पर इंजन है वैसे ही नवपद के पहले स्थान पर अरिहंत है ट्रेन के आखिरी स्थान पर गार्ड का डिब्बा होता है वैसे ही नवपद के अंतिम पद पर तप पद है।

जैसे ट्रेन के अंतिम डिब्बा गार्ड के डिब्बे से हरी झंडी नहीं दिखाई दे तो ट्रेन को चलने की अनुमति नहीं है । इधर भी पहले पद अरिहंत व अंतिम पद तप है जब तक तप का आचरण अरिहंत ना करें, तब तक अरिहंत को भी मोक्ष रूपी अगले प्लेटफार्म पर अपनी आत्मा रूपी गाड़ी को पहुंचाने की अनुमति नहीं है । अरिहंत भी तप का आचरण करते हैं तप को अपनाते हैं तप जो अंतिम स्थान पर है उसे अपने जीवन में स्थान देते हैं तब जाकर अरिहंत भी आगे की यात्रा कर सकते हैं।
उन्होंने पुनः समझाया कि जैसे तपेली के अंदर दूध डालने पर तपेली गर्म होने पर दूध स्वत: ही शुद्ध हो जाता है पीने योग्य हो जाता है इस प्रकार आध्यात्मिक जीवन में भी शरीर को तपाने से आत्मा अपने आप ऊर्जावान बनती है।

तप करने से कर्मों की निर्जरा होती है।

आत्मा को शुद्ध बनाने के लिए उसे श्रृंगारित नहीं किया जाता, उसे तपाया जाता है। जिस प्रकार कोयला काला होता है और कोयला को सफेद बनाने के लिए उसे अग्नि में डालना ही पड़ता है जलने के बाद उसका कलर सफेद होता है। इस प्रकार यदि आत्मा को श्वेत बनानाहैं शुद्ध बनाना है तो तप की अग्नि में डालना ही पड़ेगा, तभी आत्मा शुद्ध बनेगी। मुनिश्री ने यह भी कहा कि तेरापंथ धर्म संघ के आचार्य श्री महाश्रमण ने भगवान महावीर के अहिंसा संदेश को देश नहीं ,अपितु विदेश में भी पहुंचाया है तथा उन्होंने उनके धर्म संघ में अनुशासन की सराहना भी की है।

पश्चात मुनि चंद्रयश विजय जी व मुनि जिनभद्र जी द्वारा तपस्वी कल्प कोठारी को पारणा कराया गया व तप की अनुमोदना की गई। उसके पश्चात दादी सुशीला कोठारी व माता सोनिया कोठारी ने कल्प को पारणा कराया। पश्चात सभी परिवारजन व उपस्थित जनों ने कल्प को पारणा कराकर तप की अनुमोदना की।

वहीं झाबुआ ज्ञानशाला प्रशिक्षिका हंसा गादिया, दीपा गादीया, रानी कोठारी, मीना गादीया द्वारा कल्पक्षको अभिनंदन पत्र भेंट किया गया व गीत का संगान कर तप की अनुमोदना की। वहीं तेरापंथ समाज द्वारा भी कल्प कोठारी को अभिनंदन पत्र भेंट कर तप की अनुमोदना की गई। अभिनंदन पत्र का वाचन सचिव दीपक कोठारी द्वारा किया गया। कार्यक्रम का सफल संचालन पंकज कोठारी ने किया व आभार विशाल कोठारी ने माना।


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