सीकर की धोद पंचायत समिति के निदेशक व प्रधान का चुनाव हो सकता है बड़ा दिलचस्प, माकपा- कांग्रेस व भाजपा दलों के मध्य कड़ा मुकाबला होने की है उम्मीद

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अशफाक़ कायमखानी, सीकर/जयपुर (राजस्थान), NIT:

किसी समय राजस्थान में लाल टापू के नाम से विख्यात रहा धोद क्षेत्र में लाल झंडा पिछले दो विधानसभा चुनावों में मुरझाने के बाद पहले दोरंगा व फिर तिरंगा झंडा लहराने के अलावा वर्तमान सरकार में पंचायत समिति के वार्डों का नये तौर से गठन होने में सत्तारूढ़ दल के विधायक की बल्ले बल्ले होने के चलते अधीकांश वार्ड कांग्रेस के अनुकूल बनाने से उनके अधिकाधिक उम्मीदवारों के जीतने की उम्मीद लगाई जा रही है लेकिन हाल ही में हुये धोद के 57 पंचायतों के सरपंच चुनाव में अपनी अपनी पसंद अनुसार पंचायत गठन करवाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले तत्तकालीन कांग्रेस विधायक समर्थक सरपंचों को हाल ही में हुये चुनाव में हार का मजा चखने पर मजबूर होने की चर्चा आम होने के बाद अब अगले महीने होने वाले पंचायत समिति निदेशक चुनाव की रंगत बदल सकते हैं।
हालांकि सरपंच चुनाव किसी दल विशेष के आधार पर नहीं होते हैं लेकिन चुनाव लड़ने वाले अधिकांश उम्मीदवार किसी ना किसी दल से सम्बन्ध जरूर रखते हैं। चुने गये सरपंच की राजनीतिक विचारधारा व उनकी सम्बंधता से उनकी पहचान जरुर होती है। हाल ही में धोद की 57-पंचायतों के हुये सरपंच चुनावों में कुछ पंचायतों में माकपा का मतदाता अपने मतों का उपयोग भाजपा विचारधारा वाले उम्मीदवारों के पक्ष में करते नजर आये बदले में अब वो उम्मीदवार अपने समर्थकों का मत निदेशक चुनाव में माकपा उम्मीदवार के पक्ष में करते नजर आ सकते हैं, इसके उलट प्रधान के चुनाव में अगर माकपा को रोकने की जरूरत पड़ी तो कांग्रेस व भाजपा मिलकर पर्दे के पीछे रहकर एक उम्मीदवार के पक्ष में मतदान भी पहले की तरह करने में कतई चूक नहीं करेंगे चाहे प्रधान उम्मीदवार का पर्चा किसी राजनेता को निर्दलीय तौर पर खड़ा करके उसके पक्ष में मतदान करके एक दूसरे दल के सिम्बल वाले उम्मीदवार को मत ना देने की पतली गली निकलने का तरीका भी हो सकता है।

धोद पंचायत समिति के 41- वार्ड में से अधीकांश कार्डों में ओबीसी महिला उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने की सम्भावना इसलिये बनने लगी है कि प्रधान पद ओबीसी महिला के लिये आरक्षित है। माकपा के उसमान खान एवं अनुसूचित जाती-अनुसूचित जनजाति के लिये आरक्षित होने को छोड़कर धोद पंचायत समिति के प्रधान पद पर करीब करीब जाट बिरादरी का ही प्रधान बनते आ रहे हैं। अब ओबीसी महिला के लिये प्रधान पद आरक्षित होने से निवर्तमान प्रधान ओमप्रकाश झीगर की पुत्री व पूत्रवधु के अलग अलग वार्ड से अलग अलग दल से चुनाव लड़ने की सम्भावना के चलते उनमें से ही किसी एक के प्रधान बनने की सम्भावना अधिक जताई जा रही है लेकिन किरडोली व कासली वाले वार्ड से कायमखानी महिलाओं का अलग अलग दल से भी चुनाव लड़ने की चर्चा अलग संकेत दे रही है जबकि कासली वार्ड जनरल महिला के लिये आरक्षित है वहीं किरडोली जनरल होने के बावजूद ओबीसी कायमखानी महिला के माका व कांग्रेस से चुनाव लड़ने की सम्भावना जताई जा रही है।
विधायक परशराम मोरदिया के काफी नजदीकी होने के कारण निवर्तमान प्रधान ओमप्रकाश झीगर की पंचायत समिति निदेशक के लिये कांग्रेस उम्मीदवार चयन में एक तरफा चलने की सम्भावना राजनीतिक हलकों में मानी जा रही है। वहीं भाजपा में पूर्व विधायक गोर्वधन के होने के बावजूद निवर्तमान प्रधान झीगर की पुत्री के ससुर रामेश्वर रणवां व उनके पुत्र किसान मोर्चा के अध्यक्ष हरिणाम रणवां की भाजपा उम्मीदवार चयन में एक तरफा चलना लगभग तय है। माकपा में ग्रामीण तहसील व जिला कमेटी से आये नामों पर चर्चा होकर उम्मीदवार चयन का चलन होता है लेकिन राजनीतिक हलकों में कहा जा रहा है कि पूर्व विधायक कामरेड अमरा राम की उम्मीदवार चयन में प्रमुख भूमिका रहेगी। लेकिन इन सबके हटकर जिले के प्रमुख राजनीतिक परिवार व धोद पंचायत समिति के प्रधान एवं विधायक लम्बे समय तक रहने वाले महरिया परिवार की भूमिका भी उक्त चुनावों को काफी प्रभावित करेंगी। राजनीति के दांव पेंच के खिलाड़ी माने जाने वाले महरिया परिवार के वर्तमान राजनीतिक मुखिया सुभाष महरिया ने कांग्रेस उम्मीदवार की हैसियत से 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा तब माकपा के अधीकांश मतदाताओं ने उनके खिलाफ भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में मतदान इसलिए कहकर किया बताते हैं कि महरिया ने विधानसभा चुनावों में माकपा उम्मीदवारों को अन्य विधानसभा क्षेत्रों की तरह हराने के साथ साथ धोद के कांग्रेस उम्मीदवार परशराम मोरदिया को जिताने में अपनी भरपूर राजनीतिक शक्ति का उपयोग किया था। मोरदिया का सुभाष महरिया द्वारा भरपूर समर्थन करने से उनके प्रति माकपा समर्थकों के मनों में भारी गुस्सा उस समय व्याप्त हो गया था जो लोकसभा चुनाव में महरिया के विरोध में मतदान करके निकालना माना जाता है।
कुल मिलाकर यह है कि पहले पंचायत समिति निदेशक व फिर दस दिसम्बर को होने वाले धोद प्रधान का चुनाव अन्य पंचायत समितियों के चुनाव से काफी अलग व दिलचस्प होगा। जहां कांग्रेस-भाजपा व माकपा जैसे तीनों राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के मध्य कड़ा मुकाबला होना लगभग तय है। निदेशक चुनाव में अलग व प्रधान चुनाव में अलग राजनीतिक गठजोड़ बनते नजर आयेंगे। चुनावों में अंतिम समय पर निर्णय लेकर चुनाव परिणाम को प्रभावित करने के तौर पर देखे जाने वाले महरिया परिवार की रणनीति भी तीनों उक्त राजनीतिक दलों की तरह धोद में परिणाम लाने में अहम किरदार अदा कर सकती है।

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