कांग्रेस की सरकार में आदिवासियों का हो रहा है खुलकर शोषण, आदिवासियों की जमीनों पर हो रहा है अवैध कब्जा | New India Times

रहीम शेरानी, ब्यूरो चीफ, झाबुआ (मप्र), NIT:कांग्रेस की सरकार में आदिवासियों का हो रहा है खुलकर शोषण, आदिवासियों की जमीनों पर हो रहा है अवैध कब्जा | New India Times

इतिहास गवाह है कि कितनी ही सरकारें आईं और चली गईं लेकिन आज भी आदिवासी गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। आम जनता अपनी तकलीफों से निजात पाने के लिए चुनाव के समय अपने प्रतिनिधि को चुनकर विधायक, सांसद, अध्यक्ष, पंच, सरपंच बनाती है
लेकिन आदिवासियों के अपने आपको मसीहा समझने वाले उन आदिवासियों के लिए कानून और हक की लड़ाई की बात करने वाले कम ही राजनेता और समाजसेवी दिखाई देते हैं जिससे पीड़ित और शोषित आदिवासी समाज आज भी रसुदखोरों का दंश झेल रहा है।
हम अभी हल ही में आये ताजे मामले की बात करें तो मेघनगर में ऐसे कई स्थान हैं जहां आदिवासियों की जमीनों पर गैर आदिवासियों का कब्जा है। क्षेत्र के गरीब भोले-भाले आदिवासियों को आर्थिक लालच देकर और राजस्व विभाग के भ्रष्ट बेईमान अधिकारियों से सांठगांठ कर खेती की जमीनों को भी हथिया ली गई है।
शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के पीछे से लेकर तहसील कार्यालय के बीच सारी जमीनों पर नामांकन कर राजस्व संहिता धारा 170 (ख) की धज्जियां उड़ाई गई हैं।
आदिवासियों की जमीन गैर आदिवासियों के नाम कैसे कर दी गई? यहां तक कि रसूखदारो ने मंदिर मस्जिद की जमीनों को भी नहीं छोड़ा और अपना कब्जा जमा लिया। ऐसे में बड़ा सवाल है कि इन जमीनों से जुड़े मामले तहसील और एसडीम कार्यालय से महज कुछ कोसों दूर ही है शासन प्रशासन आखिर क्यों मौन धारण किए हुए हैं।

एक आदिवासी के पास वन पट्टा होने के बावजूद वन अधिकारी ने उसके उपर तान दी बंदूक, आदिम जाति विकास मंत्री से लगाई गुहार

मेघनगर से मात्र 12 किलोमीटर की दूर पर बसे ग्राम राखडिया के रहने वाले फतिया पिता पुनिया भूरिया को 2010 में वन विभाग द्वारा कक्ष क्रमांक 71 में वन पट्टा दिया गया था। 5 सितंबर को थांदला वन विभाग के रेंजर व कोमल सिंह डिंडोर एवं उनके अमले द्वारा ग्राम राखड़िया पहुंच कर 9 वर्ष पूर्व लगाए गए बांस, सीताफल, गुलमोहर, सागवान आदि के बड़े पेड़ को तहस-नहस कर दिया गया। जब इसका विरोध फतीया द्वारा किया गया तो उस पर वन विभाग के व्यक्ति ने बंदूक भी तान दी साथ ही वन विभाग द्वारा वन पट्टे की जमीन पर पशु भी छोड़ दिये गए।
हितग्राही द्वारा पौधे के जीव चक्र के दौरान पौधे का पालन पोषण कठिन परिश्रम करके किया गया एवं उन पोधो को बच्चों की तरहा बड़ा किया गया। एक तरफ तो सरकार आदिवासियों की लड़ाई लड़ने की बात करती है वहीं दूसरी तरफ आदिवासियों का खुलेआम शोषण हो रहा है!
उनका हक नहीं दिया जाता एवं कुछ रसूखदार आदिवासियों की करोडों की जमीन पर थोड़ी सी आर्थिक लालच देकर कुंडली मारकर बैठ हैं। राजस्व विभाग के अधिकारी अगर ईमानदारी से जांच करें तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।

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