श्रीकांत पुरहित, देवास ( मप्र ), NIT; 
संविधान में हिंदी को मातृभाषा का दर्जा दिया है। हमारी यह भाषा आज अपने ही देश में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है।
संविधान में हिंदी को मातृभाषा का दर्जा दिया है। हमारी यह भाषा आज अपने ही देश में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। तमाम प्रयासों के बाद भी हिंदी का उपयोग उतना नहीं हो पा रहा है जितना होना चाहिए। उधर माता-पिता अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में भेजना शान समझ रहे हैं। साथ ही सोशल मीडिया व अलग-अलग एप आने से हिंदी की त्रुटियां बढ़ती जा रही है।
हिंदी को मिले पूरा सम्मान
हिंदी का शब्दकोष अथाह है। इसका अपना महत्व है। हमारी भाषा विदेशों में पढ़ी व समझी जा रही है। ऐसे में अपने यहां हिंदी को पूरी तरह से सम्मान मिलना चाहिए। सरकारी कार्यालयों व बैंकों में हिंदी में फॉर्म भरने के लिए जो शब्दों का प्रयोग होता है, वे बेहद ही कठिन होते हैं। इनकी बजाय सामान्य व सरल शब्दों का प्रयोग होना चाहिए, ताकि हर व्यक्ति हिंदी में ही फॉर्म या लेनदेन संबंधी स्लीप भर सके।
नहीं देते त्रुटियों पर ध्यान
शब्द नहीं लिखते हुए आधे-अधूरे व रोमन लिपी में शब्द लिखे जा रहे हैं। मात्रा की अशुद्घि की ओर किसी का ध्यान नहीं है। कई बार तो शिक्षक भी बच्चों की त्रुटियों पर ध्यान नहीं देते। पूछने पर कहते हैं समझ में तो आ रहा है फिर फर्क क्या पड़ता।
हर परीक्षा का माध्यम हिंदी हो
कम्प्यूटर का युग है। हाथ से लिखने का काम लोग कम ही करते हैं। ऐसे में गल्तियों पर भी ध्यान कम जाता है। बच्चे भी मोबाइल में कोर्स पढ़ना पसंद करते हैं। अस्तित्व को बचाने के लिए सभी सरकारी परीक्षाओं का माध्यम हिंदी ही होना चाहिए। साथ ही बोलचाल में शुद्घ हिंदी का प्रयोग करना चाहिए।
किया जाए पुरस्कृत
बच्चे अंग्रेजी माध्यम में भी पढ़े, लेकिन हिंदी का भी सम्मान करे। आजकल तो हिंदी में लिखी गिनती भी बच्चे नहीं समझते। माता-पिता भी प्रसन्नता व्यक्त करते हैं कि हमारा बच्चा हिंदी तो सही समझता नहीं, लेकिन अंग्रेजी अच्छी बोल लेता है। हिंदी में विशेष योग्यता लाने वाले विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए।
माता-पिता बच्चों को सम्मान करना सिखाएं
सेवानिवृत्त हिंदी के शिक्षक डॉ. हजारीलाल वर्मा ने हिंदी भाषा के लिए बहुत योगदान दिया। इनके कई शोधग्रंथ प्रकाशित भी हुए। हिंदी हमारी पहचान है। यदि लिखने में त्रुटियां करेंगे तो अर्थ का अनर्थ हो जाएगा। आज माता-पिता को भी ध्यान देना चाहिए कि वे अंग्रेजी के साथ ही बच्चों को हिंदी के प्रति सम्मान की भावना सिखाएं।
