फराज अंसारी, बहराइच (यूपी), NIT;
दरगाह शरीफ के अन्य ग्रन्थों के अनुसार हरजत सैय्यद सालार मसऊद गाजी रहमतुल्लाह अहैल (बाले मियां) के जन्म के बारे में पाया जाता है कि इनका जन्म उस समय हुआ था जब जब महमूद गजनवी किसी जंग के दौरान अपना खेमा गाडे हुए थे, जिस राज्य से जंग कर रहे थे उससे कई बार परास्त भी हो चुके थे, ऐसी परिस्थितियों में अजमेर में अपनी सेनाओं को पुनः संगठित करने के लिये खेमा गाडे हुए थे। उसी समय खेमे में ही उनका जन्म हुआ था, तदोपरान्त महमूद गजनवी और उस राजा से पुनः जंग हूई तो गजनवी को उसमें विजय प्राप्त हूई। इस आधार पर वह गाजी को अपने लिये शुभ संकेत मानने लगे और उन्हें गजनी ले जाकर अच्छी तरबियत के साथ-साथ अरबी फारसी की शिक्षा के अलावा योग्य सैनिक शिक्षाी भी दिलवायी। महमूद गजनवी अपने भांजे गाजी को बहुत प्यार करते थे और उन्हें एक कुशल शासक के रूप में देखना पसन्द करते थे लेकिन गाजी को ताजशाही के कामों में कोई रूचि नहीं थी। उनका मन पूरी तरह ईश्वरीय प्रेम में लगा हुआ था। अल्लाह व अल्लाह के रसूल के नियम व दस्तूर और उसके फैलाव के कामों को वरीयता देते हुए इंसानी सेवा उनका मकसद था और महलों में रहने के बजाय वह एकान्तवास के जंगलों में रहकर ईश्वर से लौ लगाने के लिये शान्ति की तलाश में रहा करते थे। उनकी इस बात को देखकर महमूद गजनवी ने भी हालात से समझौता कर लिया था और उनको उनके हाल पर छोड दिया था परन्तु उनकी सुरक्षा के लिये सदैव उनके साथ सेना की एक टुकडी लगा रखी थी।
इसी क्रम में जब अपनी शिक्षा-दीक्षा पूरी कर मेरठ के रास्ते होते हुए बाराबंकी के सतरिख इलाके में जब वह अपना खोमा जामाये हुए थे तभी उनको बहराइच की प्राकृतिक सुन्दरता और वन क्षेत्रों की जानकारी लगी। परिणामस्वरूप उन्होंने बहराइच आने का मन बना लिया और सतरिख से अपनी सेना की एक छोटी टुकडी लेकर बहराइच आ गये। यहां पर अधिकांशतया भडोच जाति के लोग रहा करते थे और यही वजह है कि उस समय बहरराइच जिला भडराइच के नाम से जाना जाता था। बताया जाता है कि यहां के शासक अपनी जनता पर अत्याचार, अनाचार और तमाम दण्डात्मक कार्यवाही के लिये प्रसिद्ध थे। जनता उनसे त्राहि-त्राहि कर रही थी। ऐसे में यहां की जनता के एक समूह ने उनसे भेंट कर अपने साथ हो रहे अत्याचारों की कहानी बयां की और उस समय के जुल्मी राजाओं से निजात की गुहार लगायी। उधर दूसरी तरफ उस समय के राजाओं को पता चला कि हमारी सीमा में कोई विदेशी राजा हम पर आक्रमण करने के उद्देश्य से आया हुआ है। जिसका अमुख स्थान पर खेमा भी लगा हुआ है। ऐसी दशा में उन लोगों ने इनको फौरन हटाने की कोशिश की और परिणामस्वरूप उनसे हूई जंग में मसऊद गाजी रह. अलै. को विजय प्राप्त हूई। अपनी हार से बौखलाए क्षेत्रीय राजाओं ने पुनः संगठित होकर क्षेत्र के अन्य बाहुबली राजा सुहेलदेव की शरण ली और मदद की गुहार लगायी। लिसमें सुहेलदेव की सेना आरै हजरत सैय्यद सालार मसऊद गाजी की सेना में घमासान युद्ध हुआ। बताया जाता है कि कई दिनों तक चले इस युद्ध में जब कोई निष्कर्श नहीं निकला तब सुहेलदेव ने एक दिन शाम को अचानक धोखे से इनकी हत्या करा दी और इस तरह 10 जून 991 ई0 को अस्र के समय जब क्यारी के पास वह वजू कर रहे थे तभी झाडियों के बीच से किसी अज्ञात हमलावर द्वारा छोडे गये तीर के लगने से जामे शहादत फरमायी और वहीं पर उनको सुपुर्दे खाक कर दिया गया। बाद में जब इसकी सूचना सतरिख में इनकी सेना को मिली तो वह लोग यहां आये और उनकी व सुहेलदेव की सेना के बींच जमकर युद्ध हुआ। सुहेलदेव के पास अपार सेना थी जब कि सतरिख की सेना के पास चन्द सीमित लोग ही थे। ऐसी परिस्थिति में जिले में फैल-फैल कर युद्ध हुआ जिसमें राजा सुहेलदेव ही विजयी रहे।
जमाना बीतता गया लागों को इनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली कि तभी अचानक एक रात पडोस के एक गांव में जो आज की तारीख में सालारपुर के नाम से जाना जाता है में रहने वाली एक बांझ ग्वालिन औरत जिसको उसकी ससुराल वाले बांझ समझ कर प्रताडित किया करते थे को रात को एक सपना आया कि अमुक स्थान जहां पर आज मजार शरीफ कायम है। कोई शोहदा शहीद विराजमान है और उनकी अवलोकित शक्तियों से तुम्हारे कष्टों का निवारण हो सकता है। सुबह होने पर उस महिला ने अपने पति को सपने का पूरा विस्तार पूर्वक घटनाक्रम के बारे में बताया। जिस पर उस बांझ औरत ने उस अमुक स्थान पर जाकर वहां का जायजा लिया तो वहां पर जंगल झाडियों के अलावा कुछ नहीं था अन्त में वहां पर बैठ गयी और ज्ञानमग्न होते हुए यह दुआ मांगी की कि यदि आपके आर्शीवाद से मेरा बांझपन दूर हो जाता है तो मैं दूध और राख से आप द्वारा दिखाये गये स्थान पर मजार का निर्माण करूंगी। अन्तोगत्वा ईश्वरीये वरदान स्वरूप वह बांझ ग्वालन गर्भवती हो गयी और जब उसे पुत्ररत्न की प्राप्ति हूई तो उसने अपने पति व बच्चे के साथ सपने में दिखाये गये स्थान पर दूध और राख से मजार का निर्माण किया और इस प्रकार दुनिया वालों के सामने हजरत सैय्यद सालार मसऊद गाजी रह0अलै0 के मजार की जानकारी हूई। फिर क्या था यहां आने वालों की तादात बढने लगी और एक रोज जब शहंशाह फिरोज शाह तुगलक यहां आये और आस्ताने का हाल चाल देखा तो उन्होंने ही बाकायदा तरीके से आस्ताने आलिया का जीर्णोद्धार करा कर भव्य स्वरूप प्रदान कराया। समय बीतता गया लोग आते गये और किले इत्यादि का निर्माण चालू हुआ जो आज भी जारी है।
