जमशेद आलम, ब्यूरो चीफ, भोपाल (मप्र), NIT:
लाड़ली बहना योजना को लेकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने योजना में नए रजिस्ट्रेशन शुरू करने, मासिक राशि 3000 रुपये करने और आयु सीमा घटाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है।
फैसले की मुख्य बातें
खंडपीठ के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने यह आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि योजना शुरू करना, बंद करना, उसकी शर्तें तय करना या संचालन से जुड़े निर्णय पूरी तरह सरकार के नीतिगत फैसले हैं। जब तक योजना पूरी तरह असंवैधानिक साबित न हो, न्यायालय इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
यह जनहित याचिका रतलाम के पूर्व विधायक पारस सकलेचा द्वारा दायर की गई थी। उन्होंने तर्क दिया था कि 20 अगस्त 2023 से नए रजिस्ट्रेशन बंद होने से कई पात्र महिलाएं योजना के लाभ से वंचित हैं। साथ ही उन्होंने राशि बढ़ाने और आयु सीमा घटाने की मांग की थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे नीतिगत मामलों में PIL के आधार पर जांच नहीं की जा सकती। याचिकाकर्ता स्वयं योजना का लाभार्थी नहीं है, इसलिए भी न्यायालय का हस्तक्षेप उचित नहीं है।
यह फैसला 10-11 फरवरी 2026 के आसपास आया है, जिसकी पुष्टि विभिन्न समाचार माध्यमों जैसे दैनिक भास्कर, न्यूज18, हिंदुस्तान, पत्रिका और द प्रिंट में की गई है।
योजना की वर्तमान स्थिति
वर्तमान में लाड़ली बहना योजना के तहत 21 से 60 वर्ष की विवाहित, विधवा और तलाकशुदा महिलाओं को मासिक ₹1500 की सहायता राशि दी जा रही है (पहले यह ₹1250 थी)। नए रजिस्ट्रेशन अगस्त 2023 से बंद हैं, जिससे कई पात्र महिलाएं लाभ से वंचित हैं। सरकार ने पहले राशि 3000 रुपये तक बढ़ाने का वादा किया था, लेकिन हालिया बयानों में इसे लेकर स्पष्टता नहीं है।
पात्रता की मुख्य शर्तें
• महिला मध्य प्रदेश की स्थायी निवासी हो।
• महिला विवाहित, विधवा, तलाकशुदा या परित्यक्ता हो।
• आयु 21 वर्ष पूर्ण और 60 वर्ष से कम हो।
• परिवार की वार्षिक आय ₹2.5 लाख से अधिक न हो।
• परिवार में कोई आयकर दाता या सरकारी कर्मचारी/पेंशनभोगी न हो।
• महिला का आधार लिंक्ड DBT सक्षम बैंक खाता अनिवार्य हो।
अयोग्यता के मुख्य कारण
• आय ₹2.5 लाख से अधिक।
• परिवार में सरकारी नौकरी या पेंशन।
• आयकर दाता परिवार सदस्य।
• आयु 21 से कम या 60 से अधिक।
• मध्य प्रदेश का निवासी न होना।
पूर्व विधायक पारस सकलेचा ने कहा है कि लगभग 30 लाख पात्र महिलाएं अभी भी इंतजार में हैं और इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी की जा रही है।

