उर्दू को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रसारण को रोकने के लिए महाराष्ट्र में खड़ा किया जा रहा है हिन्दी का बखेड़ा | New India Times

नरेन्द्र कुमार, ब्यूरो चीफ, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:

उर्दू को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रसारण को रोकने के लिए महाराष्ट्र में खड़ा किया जा रहा है हिन्दी का बखेड़ा | New India Times

उर्दू भाषा को भारत में पैदा हुई भाषा करार देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से हिन्दी भाषा के सहारे धार्मिक अंध राष्ट्रवाद की राजनीति करने वाले संगठनों को झटका लगा है। महाराष्ट्र में मिलीजुली हमजोली सरकार चलाने वाले देवेन्द्र फडणवीस ने शिक्षा नीति में हिन्दी भाषा को अनिवार्य कर दिया है। देवेन्द्र सरकार में शामिल मंत्री जो कैमरे के सामने ठीक से हिन्दी में बात नहीं रख सकते वह मराठी हिंदी दोनों भाषाओं के पक्ष में बयान दे कर अपने अपने विभागों में उनके नकारापन को ढंक रहे हैं। इन मंत्रियों में से कुछ तो ऐसे है जो अपने गृह जिले की सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ने से घबराते हैं। संविधान के अनुच्छेद आठ में शामिल 22 भाषाएं समान हैं। महाराष्ट्र राज्य का निर्माण मराठी भाषा के आधार पर हुआ है, जो व्यक्ति अपने घर में और सार्वजनिक जीवन में केवल मराठी भाषा में बात करता है वो मूल रूप से मराठी है। केंद्र ने मराठी को अभिजात भाषा का दर्जा दिया है। बीजेपी की ओर से मुद्दा बनाए जाने वाले हिंदी भाषा अनिवार्यता को उत्तर बनाम दक्षिण भारत के झगड़े की पृष्ठभूमि है। उर्दू को मुसलमानों से जोड़ने वाले कर्मठियों को सुप्रीम कोर्ट ने करारा जवाब दिया है। वर्षा बगाले बनाम सरकार केस की सुनवाई में जस्टिस सुधांशू धूलिया जस्टिस के विनोद चंद्रन ने अपने 36 पेज के फैसले में साफ़-साफ़ लिखा है कि उर्दू गंगा जमुनी तहजीब और हिंदुस्तानी तहज़ीब की बेहतरीन मिसाल है। उर्दू का जन्म भारत की भूमि पर हुआ है। भाषा का धर्म नहीं होता, उर्दू को केवल मुसलमानों की भाषा मानना सच्चाई नहीं है। कोर्ट के इस फैसले के बाद क्या बीजेपी शासित राज्य उर्दू भाषा को शिक्षा नीति में जगह देंगे? असली झगड़ा मराठी बनाम हिंदी का नहीं बल्कि हिंदी बनाम उर्दू का है क्योंकि उर्दू ही हिन्दी है और हिंदी उर्दू है, दोनों एक दूसरे के बिना अधूरी है, फ़र्क है तो सिर्फ़ दोनों भाषाओं की अलग अलग लिखाई का, भाषा किसी धर्म की नहीं होती, समुदाय, क्षेत्र और लोगों की होती है, सुप्रीम कोर्ट की इस बात को समझने के लिए घृणा की नहीं सत्याग्रह की आवश्यकता है।

By nit

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.