समाजसेवी अब्दुल मलिक का रोज़े में निधन, नम आंखों से किया गया सुपुर्द-ए-ख़ाक | New India Times

मेहलक़ा इक़बाल अंसारी, ब्यूरो चीफ, बुरहानपुर (मप्र), NIT:

मृत्यु एक अटल सत्य है। प्रत्येक प्राणी को एक न एक दिन इसका स्वाद चखना है। मृत्यु कब और किस अवस्था में आएगी, इसका ज्ञान केवल अल्लाह को है। कौन-सा सद्कर्म और कौन-सी नेकी अल्लाह को प्रिय लग जाए, यह भी मनुष्य नहीं जानता। रोज़े की अवस्था में मृत्यु को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है और इस संबंध में इस्लामिक विद्वानों द्वारा विशेष हदीसों का उल्लेख भी मिलता है।

इसी सत्य को चरितार्थ करते हुए बुरहानपुर शहर की एक सम्मानित सामाजिक एवं धार्मिक शख्सियत, बंदियारा मस्जिद, खैराती बाज़ार मेन रोड, बुरहानपुर के पूर्व उपाध्यक्ष, मोमिन जमात बुरहानपुर के सरदार तथा सक्रिय समाजसेवी अब्दुल मलिक (आयु 57 वर्ष) का 1 मार्च को रोज़े की अवस्था में आकस्मिक निधन हो गया।

वे हाजी मुज़फ़्फर हुसैन अशरफ़ी (प्रसिद्ध “मान सेठ” परिवार) के सुपुत्र तथा मदरसा हलीमा सादिया, चंद्रकला के संचालक क़ारी शुएब अहमद चिश्ती के बड़े भाई थे।
उनके आकस्मिक निधन का समाचार शहर में तेजी से फैल गया, जिससे सामाजिक, धार्मिक और आमजन के बीच शोक की लहर दौड़ गई। हर व्यक्ति स्तब्ध और व्यथित दिखाई दिया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, दिवंगत ने बंदियारा मस्जिद, खैराती बाज़ार मेन रोड में ज़ोहर की नमाज़ अदा की थी। नमाज़ के उपरांत अस्वस्थ महसूस करने पर वे विश्राम के लिए अपने पैतृक निवास, बेरी मैदान स्थित घर लौटे। रोज़े की अवस्था में ही उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई और वे इस दुनिया से रुख़्सत हो गए।

मोमिन जमात बुरहानपुर सहित विभिन्न सामाजिक, धार्मिक एवं सार्वजनिक संगठनों ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है।

अब्दुल मलिक अपनी सादगी, मधुर व्यवहार और निस्वार्थ सेवा-भाव के लिए शहर में विशेष सम्मान रखते थे। वे सामाजिक एवं परोपकारी कार्यों में सदैव अग्रणी रहते थे और जनसमस्याओं के समाधान हेतु निरंतर प्रयासरत रहते थे।

अपने व्यापक जनसंपर्क और सौहार्दपूर्ण संबंधों के कारण समाज के एक बड़े वर्ग से उनका आत्मीय जुड़ाव था।
पारिवारिक विभाजन के पश्चात वे काला बाग मस्जिद, बाब-ए-अफ़ज़ल के समीप निवास कर रहे थे तथा पारिवारिक “लाइट मशीन” व्यवसाय से जुड़े हुए थे।

उनकी अंतिम यात्रा 1 मार्च की रात्रि, तरावीह की नमाज़ के पश्चात लगभग 11 बजे, उनके पैतृक निवास बेरी मैदान से निकाली गई। दाईंगा कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।

जनाज़े की नमाज़ मौलाना तारिक़, पुत्र मास्टर मोहम्मद अमीन चिश्ती (मोमिनपुरा, बुरहानपुर) ने अदा कराई। अंतिम यात्रा में शहर की जानी-मानी राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं साहित्यिक हस्तियों सहित बड़ी संख्या में नागरिक उपस्थित रहे।

दिवंगत अपने पीछे पत्नी, दो पुत्र और दो पुत्रियाँ छोड़ गए हैं।
समाचार पत्र परिवार इस अपूरणीय क्षति पर गहरा शोक व्यक्त करता है और शोक-संतप्त परिवार, विशेषकर शुएब क़ादरी, के प्रति अपनी संवेदनाएँ प्रकट करता है। अल्लाह से दुआ है कि पवित्र रमज़ान माह की बरकत से मरहूम को जन्नतुल फिरदौस में उच्च स्थान अता फरमाए। आमीन सुम्मा आमीन।

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