जमशेद आलम, ब्यूरो चीफ, भोपाल (मप्र), NIT:
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फिल्म “Yadav Ji Ki Love Story” से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की। यह याचिका विश्व यादव समाज द्वारा दायर की गई थी, जिसमें फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि फिल्म यादव समाज की छवि खराब करती है, क्योंकि इसमें यादव समुदाय की एक हिंदू युवती को एक मुस्लिम युवक से प्रेम और विवाह करते हुए दिखाया गया है। उनका कहना था कि इससे देश का सामाजिक ताना-बाना प्रभावित होता है।
कोर्ट का फैसला और प्रमुख टिप्पणियां
याचिका खारिज:
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि फिल्म के शीर्षक या विषयवस्तु में ऐसा कुछ नहीं है जो यादव समुदाय को अपमानित करता हो। यह एक काल्पनिक कहानी है और आशंकाएं निराधार प्रतीत होती हैं।
प्रमुख सवाल:
पीठ ने याचिकाकर्ताओं से पूछा, “क्या हिंदू लड़की का मुस्लिम युवक से विवाह देश के ताने-बाने को खराब करता है?” अदालत ने कहा कि फिल्म में ऐसा कोई संवाद या संदर्भ नहीं है जो समुदाय को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करता हो।
“मोटी चमड़ी रखें” टिप्पणी:
कोर्ट ने कहा कि समाज को “थिक स्किन” (मोटी चमड़ी) रखनी चाहिए। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि ऐसी फिल्मों को लोग कुछ समय बाद भूल जाते हैं।
अन्य उदाहरण:
अदालत ने पूर्व मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल संभावित असहमति के आधार पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। “बैंडिट क्वीन” मामले में भी समुदाय विशेष की आपत्ति को पहले खारिज किया जा चुका है।
यह फैसला 25 फरवरी 2026 को आया और इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व को दोहराया गया।
भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: संवैधानिक आधार
भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत एक मौलिक अधिकार है। इसमें बोलने, लिखने, प्रेस, फिल्म, कला, डिजिटल माध्यम, प्रदर्शन आदि के जरिए विचार व्यक्त करने का अधिकार शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार इसे लोकतंत्र की आधारशिला बताया है।
उचित प्रतिबंध (अनुच्छेद 19(2))
यह अधिकार पूर्ण नहीं है। राज्य निम्न आधारों पर “उचित प्रतिबंध” लगा सकता है —
• भारत की संप्रभुता और अखंडता
• राज्य की सुरक्षा
• विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध
• सार्वजनिक व्यवस्था
• शिष्टाचार या नैतिकता
• न्यायालय की अवमानना
• मानहानि
• अपराध के लिए उकसावा
ये प्रतिबंध तर्कसंगत और अनुपातिक होने चाहिए।
महत्वपूर्ण फैसले
• रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य (1950): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की आधारशिला बताया।
• एस. रंगराजन बनाम पी. जगजीवन राम (1989): संभावित विरोध के आधार पर फिल्म पर प्रतिबंध उचित नहीं।
• श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015): आईटी एक्ट की धारा 66A को असंवैधानिक घोषित किया।
• हालिया निर्णय (फरवरी 2026): “Yadav Ji Ki Love Story” मामले में अदालत ने कहा कि काल्पनिक कला या कथानक पर अनावश्यक प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है। इसे अनावश्यक संवेदनशीलता या आशंकाओं के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता। हालांकि, यह अधिकार जिम्मेदारी के साथ संतुलित रहना चाहिए ताकि सामाजिक सद्भाव और कानून-व्यवस्था प्रभावित न हो।

