अंकित तिवारी, ब्यूरो चीफ, प्रयागराज (यूपी), NIT:

महुआ डाबर संग्रहालय की ओर से अमर शहीद राजेंद्रनाथ लाहिड़ी के बलिदान दिवस 17 दिसंबर से अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के बलिदान दिवस तक आयोजित तीन दिवसीय कार्यक्रम ‘शहादत से शहादत तक’ का समापन 19 दिसंबर 2025 को सिविल लाइंस स्थित शहीद वॉल पर हुआ।
समापन दिवस पर प्रातः 10 बजे से काकोरी ट्रेन एक्शन से जुड़े दुर्लभ एवं मूल ऐतिहासिक दस्तावेजों की विशेष प्रदर्शनी लगाई गई, जिसने स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम अध्यायों को जीवंत कर दिया।
प्रदर्शनी का उद्घाटन मशाल प्रज्ज्वलन कर शहीद क्रांतिकारी मणीन्द्रनाथ बनर्जी के वंशज अरुण बनर्जी ने किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि काकोरी एक्शन में चार नहीं, बल्कि पांच शहीदों को स्मरण किया जाना चाहिए। राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह, पं. रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ और अशफाक उल्ला खां के साथ-साथ मणीन्द्रनाथ बनर्जी का नाम भी उसी श्रद्धा से लिया जाना चाहिए, जिन्होंने डिप्टी एसपी सीआईडी जितेंद्र बनर्जी को गोली मारने के बाद फतेहगढ़ सेंट्रल जेल में अनशन करते हुए शहादत दी।
भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के विद्वान एवं महुआ डाबर संग्रहालय के महानिदेशक डॉ. शाह आलम राणा ने काकोरी ट्रेन एक्शन की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए बताया कि किस प्रकार हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन को आर्थिक संकट से उबारने के लिए रणनीति बदली गई और अंततः 9 अगस्त 1925 को काकोरी एक्शन को अंजाम दिया गया। उन्होंने क्रांतिकारियों की संगठनात्मक सूझबूझ, विदेशी संपर्कों, माउजर पिस्तौल की खेप और पूरे घटनाक्रम को विस्तार से रेखांकित किया।
डॉ. राणा ने बताया कि महज 35 मिनट में सरकारी खजाना लूटा गया, जिसकी वास्तविक राशि 4679 रुपये 2 आना 2 पैसे थी, जबकि अंग्रेजी अखबारों ने इसे बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया। इसके बाद हुई गिरफ्तारियां, काकोरी षड्यंत्र केस, रौशनद्दौला कचहरी से मुकदमे का स्थानांतरण तथा 17 व 19 दिसंबर 1927 को शहीदों को दी गई फांसी तक का पूरा इतिहास उन्होंने क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया।
शहीद वॉल पर लगी इस प्रदर्शनी में सुबह से ही बड़ी संख्या में लोग पहुंचे और क्रांतिकारियों से जुड़े मूल दस्तावेजों को देखकर भावुक व रोमांचित हुए। क्रांतिकारी चिंतक अविनाश गुप्ता एवं विजेंद्र अग्रहरी ने उपस्थित जनसमूह को प्रदर्शनी का अवलोकन कराया। उत्तम कुमार बनर्जी एडवोकेट, संजू चौधरी, वीरेंद्र पाठक, गौतम कुमार बनर्जी एडवोकेट सहित अनेक लोगों का विशेष सहयोग रहा।
प्रदर्शनी में महुआ डाबर संग्रहालय में संरक्षित कई दुर्लभ धरोहरें प्रदर्शित की गईं, जिनमें सप्लीमेंट्री काकोरी षड्यंत्र केस की जजमेंट फाइल, चीफ कोर्ट ऑफ अवध का निर्णय पत्र, प्रिवी काउंसिल लंदन की अपील फाइल, काकोरी केस की चार्जशीट, खुफिया विभाग की डायरी, क्रांतिकारियों की हस्तलिखित डायरियां, ‘सरफरोशी की तमन्ना’ की मूल प्रति, शहीदों के पत्र, ऐतिहासिक अखबारी रिपोर्टें, जेल जीवन की तस्वीरें एवं फांसी के बाद के दुर्लभ छायाचित्र शामिल रहे।
गौरतलब है कि जनपद बस्ती स्थित महुआ डाबर संग्रहालय, 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महुआ डाबर गांव की भूमिका को समर्पित एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक केंद्र है। वर्ष 1999 में स्थापित इस संग्रहालय में स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी 200 से अधिक छवियां एवं सैकड़ों ऐतिहासिक अभिलेख संरक्षित हैं। वर्ष 2010 में हुए उत्खनन से इसके ऐतिहासिक महत्व की पुष्टि हुई है। आज यह भूमि ‘आजादी के महातीर्थ’ के रूप में जानी जाती है।
आग़ाज़ फ़ाउंडेशन ने किया सम्मान
महुआ डाबर संग्रहालय की प्रदर्शनी के पश्चात प्रयागराज की जानी-मानी सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था आग़ाज़ फ़ाउंडेशन द्वारा कार्यक्रम से जुड़े प्रमुख वक्ताओं एवं सहयोगियों का सम्मान किया गया।
संस्था के संरक्षक डॉ. वी. के. मिश्रा, सचिव सुदीपा मित्रा, सीमा भौमिक, अर्चना चौधरी, दोलन चक्रवर्ती एवं मौली मुस्तफ़ी द्वारा डॉ. शाह आलम राणा, अविनाश गुप्ता, विजेंद्र अग्रहरी एवं संजू चौधरी को अंगवस्त्र, श्रीफल एवं मानपत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।
