पदमालय को राज्य सरकार की ओर से मिला ब श्रेणी तीर्थक्षेत्र का दर्जा. वन विभाग द्वारा किए गए भ्रष्टाचार के जांच की उठी मांग | New India Times

नरेन्द्र कुमार, ब्यूरो चीफ, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:

पदमालय को राज्य सरकार की ओर से मिला ब श्रेणी तीर्थक्षेत्र का दर्जा. वन विभाग द्वारा किए गए भ्रष्टाचार के जांच की उठी मांग | New India Times

राज्य सरकार के तीर्थ क्षेत्र विकास प्रोग्राम में जलगांव जिले के एरंडोल विधानसभा क्षेत्र के पदमालय गणेश मंदिर को शामिल किया गया है। बजट सत्र के दौरान शिंदे सरकार ने पदमालय को तीर्थक्षेत्र विकास योजना की “ब” श्रेणी में शामिल किया है। 300 साल पहले बने इस गणेश मंदिर प्रांगण का हाल वर्तमान स्थिति में बेहद खराब हो चुका है। मंदिर के ठीक सामने पत्थर से बना तालाब है जो कई जगहों पर डैमेज हो चुका है। वह कमल के फूल के लिए फेमस है। मंदिर के पिछली दिशा की सुरक्षा दीवार गिर चुकी है। पेयजल की कोई शाश्वत योजना नहीं है। मंदिर से कुछ मीटर की दूरी पर आदिवासी समुदाय की बस्ती है जिसके बुनियादी विकास को शायद अब गति मिल सके।

वन विभाग के भ्रष्टाचार की जांच की मांग

पदमालय को राज्य सरकार की ओर से मिला ब श्रेणी तीर्थक्षेत्र का दर्जा. वन विभाग द्वारा किए गए भ्रष्टाचार के जांच की उठी मांग | New India Times

पदमालय जिस टेकडी पर है वह सारी टेकडी वन विभाग की मिल्कियत है, इस टेकडी पर वन विभाग की ओर से कैम्पा योजना के तहत किए गए पौधरोपण, सिंचाई ट्रेंचेस के काम केवल कागज पर किए गए है। वन विभाग की ओर से बनाई गई करोड़ों रूपये की सरकारी इमारते घटिया निर्माण के कारण जर्जर हो चुकी है। आयुषमान भारत के तहत डेढ़ करोड़ रुपए खर्च कर बनाई गई PHC की इमारत धूल फाक रही है। 2017 में जामनेर तहसील के शेंदुर्नी स्थित त्रिविक्रम महाराज देवस्थान मंदिर ट्रस्ट को “ब” दर्जा बहाल किया गया उसके बाद से अब तक इस मंदिर परीसर के विकास के लिए सरकारी तिजोरी से करोड़ों खर्च कर किए गए घटिया निर्माण नेताजी के चाटुकार ठेकेदारों ने भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिए हैं।

बजट सत्र खत्म, किसानों के घर में पड़ी है कपास

कल हि राज्य विधानसभा का बजट सत्र खत्म हो गया प्याज को आंशिक अनुदान देने का निर्णय लिए जाने के अलावा सरकार ने कपास उत्पादक किसानों को कोई राहत नहीं दी। विधान परिषद मे NCP के एकनाथ खडसे ने कपास दरो मे बढ़ोतरी के लिए हर संभव मांग की लेकिन सरकार ने कोई नीतिगत फैसला नही लिया। कपास के दरो को लेकर किसी समय आमरण अनशन करने वाले मंत्री गिरीश महाजन ने कपास दरो को लेकर सदन मे अपने मुंह से आश्वासन से भरा एक शब्द तक नही निकाला। उलटा विधान परिषद मे विपक्ष के सदस्यो द्वारा पूछे गए सवालो के ठोस जबाब देने के बजाय महाजन हंसी ठिठौली करते दिखाई पड़े। यही नहीं सदन के बाहर विभिन्न कार्यक्रमो मे शिरकत करते महाजन से किसानो द्वारा कपास को लेकर सवाल पूछे जाने लगे तो उसके जबाब मे मंत्री होने के नाते उनके द्वारा उनकी सरकार की प्रस्तावित नीति , फैसलो पर वक्तव्य अपेक्षित था लेकिन इसके विपरीत वह खेती के लिए पानी, 24 घंटा बिजली, खाद जैसे अपने पुराने भाषणो को दोहराते नजर आए ! सत्र के दौरान सदन मे होनेवाले कामकाज को जन जन तक पहुँचाया जाना चाहिए ताकि आम मतदाताओ यह पता चल सके कि इश्यू को नॉन इश्यू और नॉन इश्यू को इश्यू बनाकर कौन गंभीर है और कौन नौटंकी कर रहा है। बजट सत्र से कपास उत्पादक किसानो को बड़ी उम्मीद थी दरवृद्धि की आस के चलते आज भी किसानो के घर मे 60 फीसद कपास पड़ी हुई है। महाजन द्वारा दिखाए गए चुनावी सपनो मे से एक प्रोजेक्ट कॉटन टेक्सटाइल पार्क का था जो जामनेर मे बन जाता तो शायद जिले के किसानो की कपास को प्रति क्विंटल 500 या एक हजार रुपए अतिरिक्त दर मिल जाता।

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