वी.के. त्रिवेदी, ब्यूरो चीफ, लखीमपुर खीरी (यूपी), NIT:

बड़े मुद्दों को लेकर सरकार और किसानों के बीच लंबी खींचतान जारी है परंतु आम किसानों के मन में सरकार के प्रति नकारात्मक रवैया बनाने में सरकार के ही अफसरों की बड़ी भूमिका है। छोटे किसानों को तवज्जों देने की सरकार की मंशा के उलट बड़े कृषक रुतबा, धौंस और खर्च के दम पर अपनी उपज बेचने में सफल हो जाते हैं जबकि छोटे किसान इनकी मेहरबानी के मोहताज रहते हैं और निराश होकर औने पौने दाम में अपनी उपज बेचने को विवश होते हैं।
मालूम हो कि किसानों का मुद्दा लंबे अरसे से राष्ट्रीय राजनीति में अहम बना हुआ है और सरकार आम कृषकों के हितैषी होने का दम भरते नहीं थकती है परंतु वास्तविकता इसके विपरीत है। इसकी बानगी यह कि विकासखण्ड बाँकेगंज में राज्य खाद्य निगम का गोदाम बना हुआ है और प्रभारी भी क्षेत्र में तैनात हैं, इसके बावजूद गेहूं और धान की खरीददारी के लिए बाँकेगंज में क्रय केंद्र नहीं बनाया गया। इसका खामियाजा क्षेत्र के बड़े किसानों के अलावा सबसे ज्यादा छोटे और मझोले कृषकों को उठाना पड़ रहा है। उन्हें अपनी उपज बेचने के लिए अपने घरों से 15 से 20 किलोमीटर दूर गोला जाना पड़ता है। वहां पर लगी लंबी कतारें, सुस्त प्रक्रिया और खरीद कर्मियों के नखरे और बेरुखेपन से कृषकों की दो चार होना पड़ता है। उन्हें घर से दूर अपनी धान भरी ट्रालियों के साथ खरीद केंद्र के बाहर कई दिन तक गुजारना पड़ते हैं। इसके बावजूद कोई गारंटी नहीं कि उनका धान सरकारी मूल्य के तहत खरीद एजेंसी खरीद ही लेगी। उनमें से कई निराश होकर अपनी उपज वहां से निजी धान मिलों और खुदरा खरीदारों के पास ले जाकर बेहद कम दामों में बेच देते हैं। किराए की ट्रैक्टर ट्राली में धान ले जाकर विक्रय के लिए इंतजार करना लघु एवं सीमान्त किसानों के लिए बेहद कठिन है। वे पहले या दूसरे दिन ही टूट जाते हैं और कम दामों पर बेचकर निराशा के साथ घर लौट आते हैं। कारण यह कि उन्हें सरकारी मूल्य 1940 या उससे अधिक की बजाय ग्यारह या बारह सौ रुपया ही नसीब होता है, किराया ऊपर से। इस प्रकार लागत मिलना ही मुश्किल हो जाता है। चढ़ चुकी उधारी को निपटाने हेतु भी अपनी उपज तत्काल बेचना भी उनकी मजबूरी है। वहीं बड़े काश्तकार जिनके अपनी ट्रैक्टर ट्राली हैं और उनके पास बेचने को सैकड़ों कुंतल धान है। वे इंतजार और बेचने का जुगाड़ दोनों के जरिए सरकारी मूल्य पाने में कुछ हद तक कामयाब हो जाते हैं। भले ही एक छोटा हिस्सा उन्हें इसकी एवज में देना पड़े। जिसके चलते बांकेगंज क्षेत्र में सरकारी धान क्रय केंद्र ना होने के कारण छोटे गरीब किसानों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है और वह ओने पौने दामों में अपनी फसल बेचने को मजबूर रहते हैं वहीं क्षेत्रीय किसानों ने बांकेगंज में धान गेहूं क्रय केंद्र बनाए जाने की प्रशासन से मांग की है।
