संदीप शुक्ला, ग्वालियर/हैदराबाद, NIT:

हैदराबाद विश्वविद्यालय में भारतीय प्रवासी परिवारों में हो रहे सामाजिक एवं पारिवारिक बदलाव, पारिवारिक कल्याण, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, सांस्कृतिक पहचान तथा नीतिगत प्रतिक्रियाओं पर केंद्रित एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार एवं हितधारक परामर्श आयोजित किया गया। कार्यक्रम का आयोजन गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (जीकेएसएसएस), एस.आर.एम. विश्वविद्यालय, दिल्ली-एनसीआर, सोनीपत तथा हैदराबाद विश्वविद्यालय के भारतीय प्रवासी अध्ययन केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। इस अवसर पर सावित्रीबाई फुले ग्लोबल सुपर-30 शिक्षा उत्कृष्टता एवं प्रेरणा सम्मान-2026 भी प्रदान किए गए।
कार्यक्रम का शुभारंभ अमृता विद्यालयम की शिक्षिका एवं कवयित्री गया बालाजी चुम्बले के नेतृत्व में भारत के संविधान की प्रस्तावना के सामूहिक वाचन से हुआ। भारतीय प्रवासी अध्ययन केंद्र के प्रमुख प्रो. अजय के. साहू ने स्वागत उद्बोधन दिया। कार्यक्रम की रूपरेखा और सामाजिक प्रासंगिकता पर गोपाल किरन समाजसेवी संस्था के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने प्रकाश डाला।
उद्घाटन सत्र की मुख्य अतिथि हैदराबाद विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान विद्यालय की अधिष्ठाता प्रो. के. सुनीता रानी थीं। अध्यक्षता डॉ. बी.आर. आंबेडकर मुक्त विश्वविद्यालय, हैदराबाद के शिक्षा विभाग की प्रमुख प्रो. जी. मैरी सुनंदा ने की। शिक्षा एवं सामाजिक क्षेत्र में योगदान के लिए प्रो. जी. मैरी सुनंदा को सावित्रीबाई फुले सम्मान प्रदान किया गया।

कार्यक्रम में बिहार के डॉ. सुधांशु कुमार चक्रवर्ती की पुस्तक ‘विकास-क्षितिज’ का विमोचन भी किया गया। प्रो. जी. मैरी सुनंदा ने पुस्तक की शोधपरक सामग्री की सराहना करते हुए संयुक्त एवं एकल परिवारों के सामने उभर रही नई चुनौतियों पर चर्चा की और विभिन्न हितधारकों के बीच सहयोग एवं समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया।
सेमिनार में तीन तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। इनमें भारतीय प्रवासी परिवारों में सामाजिक परिवर्तन, पारिवारिक कल्याण, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, सांस्कृतिक पहचान, परिवार की बदलती संरचना, नई पीढ़ी की चुनौतियां, बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल, कानूनी समस्याएं तथा नीतिगत विषयों पर शोधपरक चर्चा हुई। विभिन्न शोधकर्ताओं ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत कर प्रवासी भारतीय परिवारों के बदलते स्वरूप और उनसे जुड़े सामाजिक सरोकारों को रेखांकित किया।
गोपाल किरन समाजसेवी संस्था के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने कहा कि भारतीय प्रवासियों को केवल विदेशी मुद्रा, निवेश या आर्थिक योगदान के स्रोत के रूप में देखने के बजाय शिक्षा, ज्ञान, तकनीक, उद्यमिता, शोध, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सामाजिक विकास के भागीदार के रूप में समझने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि विदेशों में रहने वाले भारतीयों और उनके परिवारों को भूमि एवं संपत्ति विवाद, दस्तावेज संबंधी समस्याओं, धोखाधड़ीपूर्ण लेन-देन, कानूनी सहायता तथा आपातकालीन परिस्थितियों जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं के समाधान के लिए प्रभावी संस्थागत व्यवस्था की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि प्रवासी नीति को केवल आर्थिक दृष्टिकोण तक सीमित न रखकर विदेशों में जन्मी और पली-बढ़ी नई पीढ़ी की भारतीय भाषाओं एवं सांस्कृतिक पहचान, महिलाओं, विद्यार्थियों, बुजुर्ग माता-पिता तथा पारिवारिक संबंधों से जुड़े विषयों को भी नीति के केंद्र में रखा जाना चाहिए। इसके लिए सरकार, विश्वविद्यालयों, प्रवासी संगठनों और सामाजिक संस्थाओं के बीच समन्वित प्रयास जरूरी हैं।
कार्यक्रम के दौरान ‘गिरमिटिया’ नाटक का मंचन भी किया गया। नाटक की संकल्पना, निर्देशन एवं अभिनय डॉ. सुधांशु कुमार चक्रवर्ती ने किया, जबकि छत्तीसगढ़ की अभिनेत्री भानुमती ने भी सहभागिता की। नाटक में प्रवासी मजदूरों के विस्थापन, श्रम, संघर्ष और सामाजिक परिस्थितियों को प्रस्तुत किया गया। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के लोक गायक गोपाल पोयम ने दंतेश्वरी पर आधारित लोकगीत प्रस्तुत किया। भरतनाट्यम की प्रस्तुति ने भी कार्यक्रम में सांस्कृतिक रंग जोड़ा।
सावित्रीबाई फुले ग्लोबल सुपर-30 शिक्षा उत्कृष्टता एवं प्रेरणा सम्मान-2026 के तहत शिक्षा, सामाजिक सेवा, साहित्य, संस्कृति, शोध, रचनात्मक कार्य एवं सामाजिक सरोकारों के क्षेत्र में योगदान देने वाले विभिन्न राज्यों के प्रतिभागियों को सम्मानित किया गया। सम्मानित प्रतिभागियों में आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के शिक्षाविद्, शोधकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता एवं अन्य क्षेत्रों से जुड़े लोग शामिल रहे।
कार्यक्रम में हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. गजेंद्र पाठक, भारत सरकार के उपक्रम सीएसएल की स्वतंत्र निदेशक एवं संचालक मंडल सदस्य डॉ. सीमा सूरी, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पूर्व कुलसचिव प्रो. डॉ. कृष्ण चंद रहलान, इंद्रायणी विद्या मंदिर, पुणे के प्राचार्य एवं प्रोफेसर प्रो. डॉ. संभाजी काशीनाथ मालघे, प्राचार्य डॉ. प्रमोद बाबन धिवार, डॉ. नूतन विष्णु लोणकर, डॉ. संदीप कुलश्रेष्ठ, डॉ. प्रियंका दत्ता सहित अनेक शिक्षाविद्, शोधकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
तकनीकी सत्रों में परिवार की बदलती संरचना, विदेशों में रहने वाली नई पीढ़ी की भाषा एवं सांस्कृतिक पहचान, महिलाओं की भूमिका, विद्यार्थियों की चुनौतियां, बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल, भूमि एवं संपत्ति विवाद तथा विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए कानूनी सहायता जैसे विषयों पर विचार-विमर्श हुआ। प्रतिभागियों के शोध-पत्रों और अनुभवों को इन विषयों पर आगे शोध एवं नीतिगत संवाद के लिए उपयोगी आधार बताया गया।
तकनीकी सत्र के समापन पर के. मुरली ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम के अंत में हैदराबाद विश्वविद्यालय के भारतीय प्रवासी अध्ययन केंद्र की पीएच.डी. शोधार्थी बीबा सी. बाबू ने अतिथियों, शोधकर्ताओं, प्रतिभागियों, आयोजकों एवं सहयोगियों के प्रति आभार जताया। आयोजकों ने कहा कि भारतीय प्रवासी परिवारों को आर्थिक दृष्टि के साथ-साथ ज्ञान, शिक्षा, संस्कृति, सामाजिक विकास और मानवीय संबंधों के व्यापक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है।

