सूबाई जमीअत अहले हदीस के पूर्व नाज़िम, मुल्क के वरिष्ठ उर्दू शायर एवं समाजी रहनुमा को नम आंखों से दी गई विदाई, बड़ा बाग़ कब्रिस्तान में किया गया सुपुर्द-ए-ख़ाक | New India Times

अबरार अहमद खान/मुकीज़ खान, भोपाल (मप्र), NIT:

सूबाई जमीअत अहले हदीस के पूर्व नाज़िम, मुल्क के वरिष्ठ उर्दू शायर एवं समाजी रहनुमा को नम आंखों से दी गई विदाई, बड़ा बाग़ कब्रिस्तान में किया गया सुपुर्द-ए-ख़ाक | New India Times

राजधानी भोपाल ने शुक्रवार को अपनी एक ऐसी अज़ीम शख्सियत को खो दिया, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी दीन-ए-इस्लाम की ख़िदमत, उर्दू अदब की तरक़्क़ी और समाज की रहनुमाई के लिए वक़्फ़ कर दी। सूबाई जमीयत अहले हदीस मध्य प्रदेश के साबिक़ नाज़िम, देश के वरिष्ठ उर्दू शायर और सम्मानित समाजी शख्सियत उबैदुर्रहमान ‘वफ़ा’ सिद्दीकी का सुबह लगभग 10 बजे इंतिकाल हो गया। उनके इंतिकाल की खबर से भोपाल सहित देशभर के धार्मिक, साहित्यिक और सामाजिक हलकों में गहरे शोक की लहर दौड़ गई।

मरहूम की नमाज़-ए-जनाज़ा मौलाना मोहम्मद मुदस्सिर सल्फ़ी ने पढ़ाई, जिसके बाद शाम लगभग 5 बजे बड़े बाग़ कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। जनाज़े में बड़ी संख्या में लोगों ने शिरकत कर उन्हें अश्कबार आँखों से आख़िरी विदाई दी।

मरहूम उबैदुर्रहमान ‘वफ़ा’ सिद्दीकी ने अपनी पूरी ज़िंदगी दीन-ए-इस्लाम की ख़िदमत, दावत-ओ-इस्लाह और मिल्लत की भलाई के लिए समर्पित कर दी। वह सूबाई जमीयत अहले हदीस मध्य प्रदेश के साबिक़ नाज़िम रह चुके थे तथा मिल्ली काउंसिल के रुक्न के रूप में भी लंबे समय तक सक्रिय रहे। हर दीनी और मिल्ली काम में उनकी मौजूदगी और रहनुमाई को विशेष महत्व दिया जाता था।

धार्मिक सेवाओं के साथ-साथ मरहूम उबैदुर्रहमान ‘वफ़ा’ सिद्दीकी देश के वरिष्ठ उर्दू शायरों में भी शुमार किए जाते थे। सात दशकों से अधिक समय तक उन्होंने ग़ज़ल, नज़्म और अदबी तख़्लीक़ात के माध्यम से उर्दू अदब की ख़िदमत की। उनका पहला शेअरी मजमुआ “तार-ए-पैराहन” वर्ष 1962 में प्रकाशित हुआ था, जिसने उन्हें साहित्यिक जगत में एक अलग पहचान दिलाई।

उबैदुर्रहमान ‘वफ़ा’ सिद्दीकी का जन्म वर्ष 1932 में आगरा में हुआ था। बचपन में वह धौलपुर के बाड़ी क्षेत्र चले गए, जहाँ उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और विद्वान अब्दुल मजीद अमृतसरी से उर्दू, अरबी और फ़ारसी की तालीम हासिल की। वर्ष 1947 के सांप्रदायिक दंगों के बाद वह भोपाल आ गए, जहाँ के शांतिपूर्ण माहौल और समृद्ध साहित्यिक संस्कृति ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद उन्होंने नियमित रूप से लेखन शुरू किया और 1955 के बाद मुशायरों तथा साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई।

उबैदुर्रहमान ‘वफ़ा’ सिद्दीकी का इंतिकाल न केवल जमाअत अहले हदीस बल्कि पूरे उर्दू अदब और मिल्लत-ए-इस्लामिया के लिए एक अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। उनके दीनी, सामाजिक और साहित्यिक योगदान को लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

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