जमशेद आलम, नई दिल्ली, NIT:
सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) के क्रीमी लेयर निर्धारण को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि क्रीमी लेयर या नॉन-क्रीमी लेयर का दर्जा तय करने के लिए केवल पारिवारिक आय (इनकम) को आधार नहीं बनाया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले की मुख्य बातें
1. केवल आय ही आधार नहीं होगी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि क्रीमी लेयर या नॉन-क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल आय वर्ग (इनकम ब्रैकेट) के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके साथ-साथ माता-पिता के पद (पोस्ट), सामाजिक स्थिति (स्टेटस) और सेवा की श्रेणी (जैसे सरकारी नौकरी में ग्रुप A, B, C, D) को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
2. सैलरी इनकम अकेले निर्णायक नहीं
कोर्ट ने कहा कि 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम (OM) और 2004 के स्पष्टीकरण पत्र के आधार पर सैलरी इनकम को अकेले निर्णायक नहीं माना जा सकता। स्टेटस-आधारित मानदंड ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि क्रीमी लेयर का उद्देश्य सामाजिक रूप से उन्नत वर्ग को आरक्षण के लाभ से बाहर रखना है, न कि केवल आर्थिक आधार पर भेदभाव करना।
3. हाई कोर्ट के फैसलों को बरकरार रखा
सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास, केरल और दिल्ली हाई कोर्ट के फैसलों को बरकरार रखा। इन फैसलों में कहा गया था कि PSU (सार्वजनिक क्षेत्र) और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों को सरकारी कर्मचारियों से अलग तरीके से देखना भेदभावपूर्ण है।
4. समान स्थिति वालों में भेदभाव नहीं
अदालत ने कहा कि समान स्थिति वाले लोगों को अलग-अलग तरीके से देखना संविधान के खिलाफ है। ऐसा करना “equals को unequals की तरह ट्रीट करना” होगा। क्रीमी लेयर का उद्देश्य वास्तव में पिछड़े वर्गों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाना है।
वर्तमान क्रीमी लेयर नियम (संदर्भ के लिए)
• ओबीसी नॉन-क्रीमी लेयर के लिए वार्षिक आय सीमा 8 लाख रुपये (2017 से लागू) है।
• यह सीमा मुख्य रूप से सैलरी और कृषि आय को छोड़कर अन्य स्रोतों जैसे व्यवसाय, संपत्ति आदि से होने वाली आय पर लागू होती है।
• सरकारी कर्मचारियों के लिए पद-आधारित नियम अधिक सख्त हैं। उदाहरण के तौर पर ग्रुप A अधिकारी के बच्चे क्रीमी लेयर में माने जाते हैं, भले ही उनकी आय कम क्यों न हो।
उम्मीदवारों को मिल सकती है राहत
इस फैसले से UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में OBC उम्मीदवारों को राहत मिल सकती है, खासकर उन मामलों में जहां केवल सैलरी के आधार पर उन्हें क्रीमी लेयर में शामिल कर दिया जाता था।
यह फैसला ओबीसी आरक्षण की मूल भावना को मजबूत करता है और सुनिश्चित करता है कि आरक्षण का लाभ वास्तव में जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे।

