कृषि विज्ञान केंद्र देलाखारी में नींबू वर्गीय फलों को बढ़ावा देने के लिये कार्यशाला आयोजित | New India Times

मो. मुजम्मिल, जुन्नारदेव/छिंदवाड़ा (मप्र), NIT:

कृषि विज्ञान केंद्र देलाखारी में नींबू वर्गीय फलों को बढ़ावा देने के लिये कार्यशाला आयोजित | New India Times

कृषि विज्ञान केंद्र देलाखारी, तामिया, जुन्नारदेव के अंतर्गत जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर के संचालक विस्तार सेवाएं डॉ.टी.आर.शर्मा के मार्गदर्शन में तथा केंद्रीय नींबू वर्गीय फल अनुसंधान संस्थान नागपुर के निदेशक डॉ. डी.के. घोष के मुख्य आतिथ्य में नींबू वर्गीय फल उत्पादन पर कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ.आर.एल.राऊत द्वारा किया गया।

केंद्रीय नींबू वर्गीय फल अनुसंधान संस्थान द्वारा जिले के कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति किसानों के लिए एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें जिले के 200 अनुसूचित जाति एवं 50 अनुसूचित जनजाति किसानों ने सहभागिता की। कार्यक्रम में आए प्रत्येक कृषक को नींबू, संतरा एवं मौसंबी के पौधे तथा एक बैटरी चालित स्प्रेयर प्रदान किया गया।

कार्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के संचालक विस्तार सेवाएं डॉ.शर्मा ने नींबू वर्गीय फलों की मानव जीवन में उपयोगिता एवं उनके स्वास्थ्य संबंधी महत्व के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि तामिया, जुन्नारदेव, परासिया, अमरवाड़ा एवं हर्रई क्षेत्रों में नींबू वर्गीय फलों के उत्पादन की अच्छी संभावनाएं हैं। उन्होंने यह भी बताया कि इन पौधों को खेतों में लगाकर किसान अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार कर सकते हैं।

केंद्रीय नींबू वर्गीय अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. डी.के. घोष ने बताया कि नींबू वर्गीय फलों की खेती इस क्षेत्र के लिए अत्यंत अनुकूल है और इससे किसान अच्छी आय प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि छिंदवाड़ा का संतरा पूरे देश में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है तथा नींबू, मौसंबी और संतरे की खेती इन क्षेत्रों में आसानी से की जा सकती है।

नागपुर से आए वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. डी.टी. मेश्राम ने नींबू वर्गीय फलों से होने वाले लाभों के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि नींबू की फसल किस समय लेना उपयुक्त होता है। उन्होंने बताया कि गर्मी में फल लेने के लिए जुलाई-अगस्त में आने वाले फूलों को रखना चाहिए तथा अन्य समय के फूलों को हटा देना चाहिए।

उन्होंने बताया कि गर्मी में फल आने पर नींबू के एक पौधे से पांच वर्ष बाद 2000 से 5000 रुपये तक की आय प्राप्त की जा सकती है। यदि एक एकड़ में 100 पौधे लगाए जाएं तो प्रति एकड़ 2 लाख से 5 लाख रुपये तक की आय संभव है। इसी प्रकार संतरा और मौसंबी की खेती के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी गई।

नागपुर अनुसंधान केंद्र के डॉ.नरेश मेश्राम ने नींबू वर्गीय फसलों में लगने वाले विभिन्न कीटों, उनसे होने वाले नुकसान तथा उनके नियंत्रण के उपायों के बारे में विस्तार से बताया, ताकि किसानों को आर्थिक क्षति से बचाया जा सके और बगीचे लंबे समय तक टिकाऊ बने रहें।

नागपुर अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. थिरूगनवेल ने विभिन्न किस्मों के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि कौन-सी किस्म किस प्रकार उत्पादन देती है। उन्होंने पतले छिलके वाले कागजी नींबू की विभिन्न किस्मों की उत्पादन तकनीक पर भी विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ग्राफ्टेड पौधे लगाते समय जोड़ को जमीन से ऊपर रखना चाहिए, ताकि पौधों में रोग-बीमारियां न लगें।

कार्यक्रम की प्रस्तावना वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. आर.एल. राऊत ने रखते हुए बताया कि यह कार्यक्रम जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय एवं केंद्रीय अनुसंधान संस्थान नागपुर के संयुक्त तत्वावधान में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति सब प्लान के अंतर्गत आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य क्षेत्र में रहने वाले इन वर्गों के किसानों को नींबू वर्गीय फसलों की खेती के प्रति प्रोत्साहित करना है, ताकि वे अपने जीवन स्तर को बेहतर बना सकें।

कार्यक्रम में नींबू वर्गीय फसलों की सुरक्षा के लिए बोर्डो मिश्रण बनाने की विधि भी किसानों को प्रायोगिक रूप से समझाई गई। इसमें बताया गया कि नीला थोथा और चूने की सहायता से बोर्डो मिश्रण किस प्रकार तैयार किया जाता है।

कार्यक्रम का संचालन कृषि विज्ञान केंद्र छिंदवाड़ा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. आर.के. झाड़े ने किया। ग्राम देलाखारी के वरिष्ठ समाजसेवी श्री वीरेंद्र राय ने कार्यक्रम में विशेष सहयोग प्रदान किया। तामिया के अनुविभागीय अधिकारी कृषि प्रमोद बट्टी ने अपने उद्बोधन में किसानों से अन्य फसलों के साथ नींबू वर्गीय फसलों को अपनाने का आह्वान किया।

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