दस मोहर्रम, यौमे आशूरा पर कर्बला के शहीदों का निकला मातमी जुलूस | New India Times

अरशद आब्दी, ब्यूरो चीफ, झांसी (यूपी), NIT:

दस मोहर्रम, यौमे आशूरा पर कर्बला के शहीदों का निकला मातमी जुलूस | New India Times

यौमे आशूरा को “शोहादा-ए-करबला” को खिराजे अक़ीदत पेश करने के ग़मगीन अवसर पर ‘इमाम बारगाह हुसैनी’ मेवाती पुरा में अलविदाई मजलिसे अज़ा हुई।जिसमें सैकड़ों शोकाकुल श्रृध्दालुओं ने शिरकत की। मर्सियाख्वानी में जनाब सरदार हुसैन (बिजनौर), इं0 काज़िम रज़ा, आबिद रज़ा और साथियों ने “ रोयें न क्यूं कर ग़ुलाम – हो गया मोहर्रम तमाम” मर्सिया पढा। संचालन जनाब सैयद ज़फर आलम ने किया।
तदोपरांत कुम – ईरान से विशेष निमंत्रण से पधारे मौलाना सैय्यद मोहम्मद जोन आब्दी साहब ने कहा,” इमाम हुसैन ने यज़ीद की सेनापति के सामने हिंद (भारत) आने का प्रस्ताव रखा लेकिन उन्हें घेर कर कर्बला लाया गया। ऐसे में भारत के साथ कहीं न कहीं इमाम हुसैन की शहादत का संबंध है- दिल और दर्द के स्तर पर। यही कारण है कि भारत में बड़े पैमाने पर मुहर्रम मनाया जाता है।
हम हिंदुस्तानी मोहर्रम को सच के लिये क़ुर्बान हो जाने के जज़्बे से शोकाकुल वातावरण में मनाते हैं, दत्त और हुसैनी ब्राहमण के साथ अन्य सम्प्रदाय के श्रृध्दालु जन एवं शिया मुसलमान तो पूरे दस दिन सोग मनाते हैं, सादा भोजन करते हैं, काले कपडे पहनते हैं और ग़मगीन रहते हैं। यह पर्व हिंदू-मुस्लिम एकता को एक ऊँचा स्तर प्रदान करता है।”

दस मोहर्रम, यौमे आशूरा पर कर्बला के शहीदों का निकला मातमी जुलूस | New India Times

शोकाकुल वातावरण में श्रृध्दांजली अर्पित करते हुऐ सैयद शहनशाह हैदर आब्दी ने कहा,”दरअसल इमाम हुसैन की शहादत को किसी एक धर्म या समाज या वर्ग विशेष की विरासत के रूप में क़तई नहीं देखा जाना चाहिए। हमें गर्व है कि हम हिन्दुस्तानी हैं और इमाम हुसैन के “अज़ादार” हैं। इसलिये वर्तमान आतंकवाद, अन्याय, अत्याचार और पक्षपात के विरूध्द सशक्त संघर्ष कर ही करबला के शहीदों को सच्ची श्रृध्दांजली दे सकते हैं।”
इसी ग़मगीन माहौल में “आया है अलम और अलमदार न आया।“ की मातमी सदाओं के साथ नौहा-ओ-मातम हुआ और मातमी जुलूस बरामद हुआI उधर घरैय्या लाइन से अंजुमने हुसैनी के नेतृत्व में अंजुमने तमन्नाए अब्बास के मातमदारों का मातमी जुलूस बरामद हुआ जो गंदीगर टपरे पर अंजुमने अब्बसिया के मातमी जुलूस में शामिल होगया। नौहा ख़्वान सर्वश्री सैयद अदीब हैदर, ज़ुल्फिक़ार हुसैन, सुख़नवर अली, साहिअबे आलम, अली समर, अनवर नक़्वी, तशब्बर बेग, आबिद रज़ा ने नौहे पढ़े।
यहां मौलाना शाने हैदर ज़ैदी ने कहा,”वर्तमान समय में जबकि इस्लाम पर एक बार फिर उसी प्रकार के आतंकवाद की काली छाया मंडरा रही है। साम्राज्यवादी व आतंकवादी प्रवृति की शक्तियां हावी होने का प्रयास कर रही हैं तथा एक बार फिर इस्लाम धर्म उसी प्रकार यज़ीदी विचारधारा के शिकंजे में जकड़ता नज़र आ रहा है।
ऐसे में हज़रत इमाम हुसैन व उनके साथियों द्वारा करबला में दी गई उनकी कुर्बानी और करबला की दास्तान न सिर्फ प्रासंगिक दिखाई देती है बल्कि हज़रत हुसैन के बलिदान की अमरकथा इस्लाम के वास्तविक स्वरूप व सच्चे आदर्शों को भी प्रतिबिंबित करती है। इस्लामी रंगरूप में लिपटे आतंकवादी चेहरों को बेनक़ाब किए जाने व इनका मुकाबला करने की प्रेरणा भी देती है।”
सोगवारों ने जंजीरों और क़मा का मातम कर शोक प्रकट किया।दस मोहर्रम, यौमे आशूरा पर कर्बला के शहीदों का निकला मातमी जुलूस | New India Times

अंत में श्री नज़र हैदर – फाईक़ भाई ने प्रेस, प्रशासन, पुलिस, सहयोगी अंजुमनों और अज़ादारों के साथ सभी का आभार ज्ञापित किया और मौलाना साहब ने समस्त विश्व के कल्याण के लिये प्रार्थना की और अज़ादारों ने “आमीन” कहा I करबला में अलमे मुबारक, ज़ुलजनाह और ताबूत की शबीह पर पुष्पांजली अर्पित कर आचार्य विष्णु गोलवलकर, मौलाना शाने हैदर ज़ैदी, वीरेन्द्र अग्रवाल और सैयद शहंशाह हैदर आबदी ने साम्प्रदायिक सौहार्द की विरासत को आगे बढाया I

दस मोहर्रम, यौमे आशूरा पर कर्बला के शहीदों का निकला मातमी जुलूस | New India Times

इस अवसर सर्व श्री मौलाना हैदर अली गाज़ी साहब, मौलाना सैयद फरमान अली साहब, मौलाना सैयद मिक़दाद हुसैन (भोपाल) ज़ायर सगीर मेहदी, हाजी तकी हसन, शाकिर अली, मज़हर हसनैन, मोहम्म्द शाहिद, ज़मीर अली, रिज़वान हुसैन, ज़फर हसनैन, समर हसनैन,सैयद कर्रार हुसेन, सलमान हैदर, अस्कर अली, मोहम्मद इदरीस, शाहरुख हुसैन, आसिफ हैदर, दानिश अली, फज़ले अली, नादिर अली, शहज़ादे अली, शाहनवाज़ अली , ताज अब्बास, अता अब्बास, मोहम्मद अब्बास, रईस अब्बास, सरकार हैदर” चन्दा भाई”, आरिफ गुलरेज़, नजमुल हसन, ज़ाहिद मिर्ज़ा, मज़ाहिर हुसैन, ताहिर हुसैन, ज़ामिन अली, राहत हुसैन, ज़मीर अब्बास, आबिस रज़ा, सलमान हैदर, अली जाफर, अली क़मर, फुर्क़ान हैदर, निसार हैदर “ज़िया”, मज़ाहिर हुसैन, आरिफ रज़ा, इरशाद रज़ा, असहाबे पंजतन, जाफर नवाब, काज़िम जाफर, वसी हैदर, नाज़िम जाफर, नक़ी हैदर, जावेद अली, क़मर हैदर, ज़ामिन अब्बास, ज़ाहिद हुसैन” “इंतज़ार”,अख़्तर हुसैन, नईमुद्दीन, मुख़्तार अली, के साथ बडी संख्या में इमाम हुसैन के अन्य धर्मावलम्बी अज़ादार और शिया मुस्लिम महिलाऐं बच्चे और पुरुष काले लिबास में उपस्थित रहे। “अलविदा अलविदा, ऐ हुसैन अलविदा” की गमगीन सदाओं के साथ यौमे आशूरा के मातमी जुलुस का समापन हो गया।

यह जानकारी सैयद शहनशाह हैदर आब्दी ने दी है।

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