जाय फुल लर्निंग को लेकर सरकारी शिक्षकों में नहीं दिख रहा है कोई उत्साह | New India Times

Edited by Pankaj Sharma, NIT:

लेखक: ममता वैरागी

जाय फुल लर्निंग को लेकर सरकारी शिक्षकों में नहीं दिख रहा है कोई उत्साह | New India Times

आज एक बात का बहुत अफ़सोस हुआ और हो भी क्यों ना, बात यह है कि प्राइवेट स्कूलों की तर्ज पर शासन ने विगत वर्ष से नये सत्र की शुरुआत अप्रैल माह में कर दी है, इसमें खेल खेल में गतिविधियों पर बच्चों को कुछ सीखाना और कुछ पढ़ाना था, वह भी खाली हाथ, यानी बच्चे बस्ता लेकर नहीं आये। दिनों को देखें तो महज पंद्रह दिन थे शिक्षक के पास ऐसे में पहले गर्मी का बहाना बनाया, तब शासन ने प्रातःकाल की शाला कर दी, वहां पर भी यह स्थिति की शाला बंद पाई गई, तब शिक्षकों का कहना कि बच्चे लेने गये तब यहां विचार आया कि एक था चाणक्य जिसने अशोक बनाओ दिया, केवल एक बच्चा, फिर शिक्षक क्यों शाला नहीं जाते। माना बच्चे नहीं आते, पर यदि समय पर रोज शाला खुले ओर एक दो बच्चे भी आएं और उन्हें भी शिक्षक बताएं तो तमाशा देखने जैसे बच्चे दौड़ पड़ते हैं वैसे ही शाला में से आवाज आते ही बच्चै आ जाते हैं। भले मत पढाते, पर शाला खुली पाई जाती तो उत्तम रहता।
जब सर्विस नहीं लगती तब सब उसे पाने के लिए दिन रात एक कर देते हैं और मिल जाने पर घर बैठना अच्छा लगता है क्यों?
बात ना शासन की है और ना अधिकारियों की, बात है हर शिक्षक के कर्तव्य की और जिन बच्चों से तुम्हें रोजगार प्राप्त है उन बच्चों का भविष्य थोड़ा भी बना दें तो ऊपर वाला भी आशीष देते, यदि तुम इस तरह कर रहे हो तो दूसरा शिक्षक तुम्हारे बच्चों के साथ ऐसा करेगा। बात कड़वी है पर जो वास्तविक शिक्षक के पद पर आसीन होते हैं उन्हें पहले दिन से ही पता रहता है कि हमें इन बच्चों को पढ़ाने के ही रूपये मिलेंगे, फिर क्यों इस तरह की हरकत? वैसे भी जून में प्रन्दह दिन मिलते हैं, उनमें बच्चे कम होते हैं। जुलाई अगस्त में आते हैं कि प्रशिक्षण शुरू हो जाता है जिससे शाला में शिक्षक नहीं जा पाते, फिर सोयाबीन में एक माह शाला में बच्चे नहीं रहते, तो फिर कितने दिन बचे जो तुम फिर भी अपना ज्ञान नहीं देना चाहते। माना शिक्षक ईमानदार हैं बच्चे नदारद हैं पर जो हैं वह तो है ही ना, उन्हें एसा पढ़ाओ कि वह A में आयें और उनकी संगत से दूसरे भी पढ लें, यही तो सर्व शिक्षा अभियान है। तुम क्यों अपने ही गांव के अपने ही हाथ नीचे आए बच्चों को नहीं पढाते और क्यों कोई अच्छे नागरिक नहीं दे पाते? हम सभी को पता है हमारे हाथ नीचे से निकले बच्चे हमें नहीं भूलते। वह हमारा अनुसरण करते हैं, उन्हें सब याद रहता है। फिर अपनी छबि खराब क्यों? जब हमारा आफिस का कोई काम नहीं होता हम बाबू पर गुस्सा होते हैं, तो सही है ना कि हमारा बच्चा नहीं पढ़ पाया तो दूसरे नाराज तो होंगे।
अब तो हमें यह करना चाहिए कि हर वक्त हम तरह तरह से बच्चों को ऐसा बना दें कि अधिकारी और शासन, गांव, और पालक देखते रह जाएं।
आज जरूरत है फिर गुरू द्रोण, आचार्य, या चाणक्य बनने की। आओ आज प्रण करें सभी शिक्षक अपने अपने विद्यालय का नाम रोशन करें। यही प्रार्थना है एक शिक्षक की आप सभी शिक्षकों से।

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