Edited by Arshad Aabdi, NIT:

लेखक: सैय्यद शहंशाह हैदर आब्दी
आतंकवाद मुक्त ज़िला घोषित कर जश्न मनाया गया था न अभी कुछ दिन पहले ही कश्मीर में?

क्या हुआ सर, 14 फरवरी 2019 जब दुनिया “वेलेंटाइन डे” मनाकर मोहब्बत और ख़ुशी में झूम रही थी, जुमलेबाज़ी और झूठे दावों के चक्कर में चली गईं 40 से ज़्यादा केन्द्रीय रिज़र्व पूलिस बल के बेक़ुसूर जवानों की जाने? 15 साल में सबसे बड़ा हमला???
अंतरात्मा दुखी है साहब। “आतंकियों का हमला कायरता”, “ख़ून की एक-2 क़तरे का बदला लेंगे”, “जवानों की क़ुर्बानियां बेकार नहीं जायेगी।” “मुंह तोड़ जवाब दिया जायेगा” आदि आदि। लेकिन कब?
ऐसे फिल्मी डायलॉग सुनते सुनते कान पक गये साहब।
रैलियों में How’s the Josh कहने वाले, सिनेमा घर में How’s the Josh चिल्लाने वाली रक्षामंत्री, नेता कहां हैं? उन्हें ये समझ जाना चाहिए कि फिल्म में हुई जय – जय से अपनी पीठ थपथपाने से कुछ नहीं होगा। आपके तमाम दावों के बाद भी फिर हमारे देश की 40 से ज़्यादा बेशक़ीमती जवान शहीद हो गये हैं।
घिन्न आती है ऐसे सियासतदानों पर जो कहते हैं कि सूरक्षाबलों में नौकरी करना है तो जान भी गंवानी पड़ेगी। डरते हैं तो मत कीजिए नौकरी सुरक्षाबलों में।
देश के जवानों की ज़िंदगियों के आड़ में राजनैतिक रोटियां सेंकने वाले ऐसे बददिमाग़ नेताओं और उनकी औलादों को दो चार दिन के लिए सियाचीन बॉर्डर पर खड़ा कर देना चाहिए।
आखिर जवाबदेह कौन है? रिपोर्ट थी कि हमला हो सकता है। इसकी जानकारी पहले ही थी, फिर क्यों नहीं रोक पाए? बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार एक सुरक्षा अधिकारी ने कहा है कि जानकारी थी और इस हमले को रोका जा सकता था। दहशतगर्द हमले के बाद फौरन सारी जानकारी आ गई, आदिल अहमद डार मास्टरमाइंड था, आतंकी संगठन “जैश -ए – मोहम्मद” ने ज़िम्मेदारी भी ली है।
फिर हमला क्यों नहीं रोक पाए? जहां चप्पे चप्पे पर चेकिंग है, वहां 350 किलो विस्फोटक लेकर दहशतगर्द कैसे घुस आए?

अनगिनत सवालों और गुस्से के बीच मन ग़मज़दा है कि हमारी हिफाज़त में लगे जवान शहीद हो गए। मांओं की गोद सूनी हो गईं। बहनों ने भाई खो दिए। बीवियां बेवा हो गईं। बच्चे यतीम हो गए। ना जाने कितने रिश्ते सिसक रहे हैं?
पूर्व आइपीएस ध्रुव गुप्त लिखते हैं कि तजुर्बों के आधार पर कहा जा सकता है कि पिछ्ले तीन दशक से पाकिस्तान और आतंकी हमलों को रोकना हमारी सरकारों के बस में नहीं रहा। रणनीति कभी सही दिशा में नहीं गई
सवाल है कि आखिर क्यों ऐसा हुआ?
अब बदले की बात भी होगी। यक़ीनन दस-बीस मार दिये जाऐंगे। पता नहीं बेक़ुसूर या हक़ीक़त में दहशत गर्द? लानत है सरकारों पर।
यक़ीनन एक और सर्जिकल स्ट्राइक का रास्ता तैयार हो गया। ओपरेशन होगा। चुनाव के लिये मुद्दा मिल गया। सारे मुद्दे दब जायेंगे। इस मुद्दे पर ज़ोरदार सियासत होगी। वोट भी मिलेंगे लेकिन शहीद बेक़ुसूर और सूरक्षा जवान अपने परिवार में वापस आयेंगे?
यह बेक़ुसूरों की लाशों पर सियासत कर सत्ता हासिल करने की चेष्टाऐं कब तक?
आंख बंद कर विश्वास करना बंद कीजिए साहब। हाज़िर दौर के ज़्यादातर सियासतदां बेशर्म, बेउसूल, कमीने और झूठे हैं। इन्हें शर्म नहीं आती बल्कि बेक़ुसूरों की लाशों पर पैर रखकर हुकुमत की गद्दी पर बैठना रास आता है।
क्यों नहीं पाकिस्तान से सारे सम्बंध ख़त्म किये जाते?
फिल्हाल इस मुश्किल समय में सरकार और देश को शहीद होने वाले जवानों के परिवारों से माफी मांगनी चाहिए और हर संभव मदद वास्तव में करना चाहिए और इस पर वोटों की राजनीति नहीं होनी चाहिए।
हमारे जैसे करोड़ों गमज़दा हिन्दुस्तानियों के दिल की आवाज़ है,” दहशतगर्दी का जवाब बंद फौलादी मुट्ठी से दिया जाये और पाकिस्तान से राजनयिक, सामाजिक, आर्थिक, व्यापारिक सभी प्रकार के सम्बंध, तुरंत समाप्त किये जायें फिर “सर्जिकल स्ट्राइक” इस्लामाबाद तक की जाये।

क्या ऐसा हो सकेगा? इस कठिन और गंभीर सवाल और शहीदों को समर्पित किसी शायर की इन पंक्तियों,
“नज़र झुका के जिये हम, न सर झुका के जिये,
सितमगरों की नज़र से नज़र मिला के जिये।
अब एक रात कम जिये तो हैरत क्यूं?
हम उनके साथ थे जो मशअलें जला के जिये।”
के साथ – पुन: शहीदों को तहेदिल से सलाम।
जय हिन्द।
शरीके ग़म – एक ग़मज़दा हिन्दुस्तानी,
सैय्यद शहंशाह हैदर आब्दी, समाजवादी चिंतक झांसी।
