फराज़ अंसारी, ब्यूरो चीफ बहराइच (यूपी), NIT:

जिले की स्वास्थ्य सेवाएं पिछले कई दिनों से सवालों के घेरे में हैं। 80 से ज़्यादा मौतों के बाद से जिला अस्पताल की अव्यस्थाओं व लापरवाहीयों ले खिलाफ सांसद तक ने जिला अस्पताल प्रांगण में बैठ कर धरना तक दिया लेकिन नतीजा अब भी सिफर का सिफर ही दिखता नज़र आ रहा है। अगर हम बात करें महिला जिला चिकित्सालय की तो यहाँ का हाल तो अब और भी बदतर होता चला जा रहा है। यहां संवेदनाओं की कोई अहमियत ही नहीं रह गयी है। योगी सरकार के इस अस्पताल में यदि आपको अपने मरीज का इलाज कराना है तो पहले जाइये किसी स्कूल में अपना दाखिला करा कर बोलने का सलीका सीख कर आइये फिर अपने तड़पते मरीज को इस जिला चिकित्सालय में भर्ती कराइये वरना अगर गलती से भी आपने जिला अस्पताल में तैनात डॉक्टर साहिब से तनिक भी ऊंची आवाज में बात कर ली या उनसे कोई सवाल कर लिया तो आपके मरीज को तत्काल रेफर कर दिए जाने का तुगलकी फरमान डॉक्टर साहिब की ओर से जारी कर दिया जाएगा और मजबूरन आपको अपने मरीज की बिगड़ी हालत के कारण नहीं बल्कि डॉक्टर साहिब से बात करने और उनसे सवाल करने पर राजधानी के अस्पतालों में परिक्रमा करनी पड़ सकती है। कहते हैं कि डॉक्टर भगवान का रूप होता है लेकिन ज़रा कल्पना कीजिये कि जब धरती का भगवान कहे जाने वाले डॉक्टर इनसानियत का पाठ भूल अपने अहेम (ईगो) में आ जायें तो इन्हें आप क्या कहेंगे। जिस अस्पताल में पहुंच डॉक्टर साहिबा के मुख से संतावना वाली दो चार बातें सुन ही मरीजों और तीमारदारों के माथे की चिंता की लकीरें मिट सी जाती हैं उसी अस्पताल में तैनात डॉक्टर साहिबा की बातें सुन मरीजों और तीमारदारों में एक तर से त्राहिमाम सा मचा रहता है। अब तो हालत यह कि अपने मरीज की गम्भीर होती हालत के बारे में भी डॉक्टर साहिबा से बताने में बेचारे तीमारदारों को सोचना पड़ रहा है कि कहीं डॉक्टर साहिब का पारा हाई न हो जाये।
बताते चलें कि मंगलवार को पयागपुर से आई प्रसूता को प्रसव पीड़ा होने पर जिला महिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। जहां अपने मरीज को तड़पता देख परिजनों ने जब मजूदा अस्पताल कर्मियों से बात की तो पहले तो नर्सिंग स्टाफ़ ने ही प्रसूता के परिजनों व साथ में आई आशा बहू से बदसलूकी की इसके बाद जब ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर साहिबा आईं तो उनसे इसकी शिकायत की, उधर तड़पते मरीज की हालत से बेचैन परिजनों ने डॉक्टर साहिब से अपने मरीज के हालत के बारे में सवाल कर लिया, उनका सवाल करना था कि डॉक्टर साहिबा गुस्से से लाल पीली हो गयीं और इसके बाद उन्होंने आशा सहित परिजनों पर फटकार की झड़ी लगा दी। डॉक्टर साहिब का पारा इतना चढ़ गया था कि उन्होंने यहां तक आशा से कह दिया इसके (प्रसूता के परिजन) के चलते आज मरीज रेफर हो जायेगा उनका गुस्सा यहीं तक सीमित नहीं रहा, इसके आगे वह तीमारदारों को तमीज़ का पाठ पढ़ाने लगीं कि आप एक डॉक्टर से बात कर रही हैं किसी घसियारे से नहीं और यहां सिर्फ मेरी आवाज आनी चजिये किसी और कि नहीं। जी ठीक कहा डॉक्टर साहिबा आपने ये गांव में रहने वाले बेचारे क्या जाने कि किससे कैसे बात की जाती है लेकिन आपने तो डॉक्टर की डिग्री हासिल की हैं आपको तो पता है कि किसी मरीज को उसकी बिगड़ी हालत पर रेफर किया जाता है न कि उसके साथ के तीमारदारों द्वारा किसी डॉक्टर से एक आध सवाल पूछ लेने पर जवाब देने के बजाए लताड़ लगानी चाहिए। आप एक डॉक्टर हैं और मरीजों को बेहतर इलाज देने के साथ साथ उनके साथ आये तीमारदारों को संतावना देना भी आप ही का धर्म है लेकिन शायद सरकारी कुर्सी की चमक के आगे आपको अपना यह कर्तव्य याद नहीं रहा। सवाल यह उठता है कि हर रोज जिला अस्पताल में तैनात डॉक्टरों से लेकर स्टाफ नर्सों और स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा इस तरह की अभद्रताएँ किया जाना उजागर होता रहा है, मामला तूल पकड़ता है तो उसकी जांच शुरू हो जाती है लेकिन जो जांचे शुरू होती हैं वह खत्म कब हो जाती हैं यह किसी को पता भी नहीं चलता। उम्मीद है कि इस घटना के उजागर होने के बाद डॉक्टर साहिबा को अपने दायित्वों का बोध होगा और आगे से वह मरीजों व तीमारदारों से इस तरह से पेश नहीं आयेंगी। वहीं देखना यह भी है कि जिम्मेदार इस प्रकरण को कितनी गम्भीरता से लेते हैं?
