कुरुक्षेत्र के बौद्ध स्तूप की उपेक्षा पर गंभीर सवाल, पुरातात्त्विक अभिलेख सार्वजनिक कर वैज्ञानिक संरक्षण की मांग | New India Times

संदीप शुक्ला, ब्यूरो चीफ, ग्वालियर (मप्र), NIT:


गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS) के अध्यक्ष एवं शोधकर्ता श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने कुरुक्षेत्र के थानेसर क्षेत्र में स्थित बौद्ध स्तूप के संरक्षण, वैज्ञानिक अध्ययन तथा उससे संबंधित पुरातात्त्विक अभिलेखों को सार्वजनिक किए जाने की मांग की है।

श्री निमराजे ने कहा कि कुरुक्षेत्र को केवल महाभारत की कथा तक सीमित करके देखना उसके व्यापक ऐतिहासिक एवं पुरातात्त्विक स्वरूप को सीमित करना होगा। प्राचीन थानेसर क्षेत्र में विभिन्न कालखंडों के पुरातात्त्विक साक्ष्य उपलब्ध हैं, जिनमें बौद्ध स्थापत्य के प्रमाण भी महत्वपूर्ण हैं।

सरकारी अभिलेख में स्वयं दर्ज है “Buddhist Stupa at Thanesar”

शोधकर्ता के अनुसार हरियाणा सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के आधिकारिक विवरण में थानेसर के इस स्थल को “Buddhist Stupa at Thanesar” के रूप में दर्ज किया गया है। सरकारी विवरण में इसे स्तूप के रूप में तथा इसका कालखंड लगभग प्रथम शताब्दी ईस्वी से आठवीं शताब्दी ईस्वी तक बताया गया है।

यह स्थल कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के निकट तथा ब्रह्मसरोवर के आसपास स्थित पुरातात्त्विक क्षेत्र से संबंधित है। सरकारी विवरण में लगभग तीन एकड़ क्षेत्र में फैले टीले तथा वहाँ प्राप्त पकी ईंटों की अनेक संरचनाओं का उल्लेख मिलता है।

कुषाण, गुप्त और वर्धनकालीन संरचनाएँ महत्वपूर्ण प्रमाण

उपलब्ध पुरातात्त्विक अभिलेखों एवं प्रकाशित शोध के अनुसार इस क्षेत्र में अलग-अलग कालों की ईंट संरचनाएँ सामने आई हैं। इनमें प्रारंभिक संरचनाओं को कुषाणकालीन, एक संरचना को गुप्तकालीन तथा बाद की संरचनाओं को वर्धनकाल एवं मध्यकालीन चरणों से संबंधित बताया गया है।

श्री निमराजे ने कहा कि इससे स्पष्ट होता है कि यह स्थल केवल एक काल की धार्मिक संरचना नहीं है, बल्कि अनेक शताब्दियों में विकसित हुए बहुस्तरीय पुरातात्त्विक परिसर के रूप में अध्ययन योग्य है।

बौद्ध स्तूप के साथ विहार के अवशेषों का भी उल्लेख

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) में उपलब्ध प्रकाशित शोध में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र एवं ब्रह्मसरोवर के निकट brick stupa तथा monastery/vihara remains का उल्लेख मिलता है।

यदि विहार के अवशेषों की पुष्टि विस्तृत वैज्ञानिक जाँच से होती है, तो इसका महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि इससे यह संभावना मजबूत होगी कि क्षेत्र में केवल बौद्ध स्मारक ही नहीं, बल्कि बौद्ध धार्मिक-सामुदायिक गतिविधियों का भी केंद्र रहा होगा।

हालाँकि, श्री निमराजे ने स्पष्ट किया कि विहार संबंधी निष्कर्ष को अंतिम प्रमाण मानने के बजाय इसकी स्वतंत्र पुरातात्त्विक पुष्टि के लिए वैज्ञानिक उत्खनन एवं अन्य आधुनिक तकनीकों की आवश्यकता है।

1994–95 और 2010–13 के पुरातात्त्विक कार्यों की रिपोर्ट सार्वजनिक हों

श्री निमराजे ने मांग की कि वर्ष 1994–95 में किए गए scientific clearance तथा 2010–13 के दौरान किए गए पुरातात्त्विक वैज्ञानिक कार्यों से संबंधित सभी मूल अभिलेख सार्वजनिक किए जाएँ।

इनमें—

– Field Records
– Site Plans
– Trench Plans
– Photographs
– Pottery Registers
– Antiquity Registers
– Conservation Records
– GIS Records
– Scientific Clearance Reports
– पूर्व निरीक्षण रिपोर्ट

विशेष रूप से सार्वजनिक किए जाने चाहिए।

उन्होंने कहा कि Original Field Record और Published Report की तुलनात्मक समीक्षा से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि स्थल की पुरातात्त्विक संरचनाओं, कालक्रम और अवशेषों का दस्तावेजीकरण किस प्रकार किया गया है।

ह्वेनसांग के विवरण को भी पुरातत्व के साथ जोड़कर देखा जाए

सातवीं शताब्दी में भारत आए चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) के यात्रा-विवरणों में थानेसर में बौद्ध संस्थानों की उपस्थिति का उल्लेख मिलता है। ऐतिहासिक साहित्य में वहाँ बौद्ध मठों एवं भिक्षुओं की संख्या का भी उल्लेख मिलता है।

श्री निमराजे ने कहा कि साहित्यिक स्रोतों को वर्तमान स्तूप से सीधे जोड़ने में वैज्ञानिक सावधानी आवश्यक है, लेकिन ह्वेनसांग का विवरण थानेसर के बौद्ध इतिहास के व्यापक अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण स्रोत है।

इसी प्रकार अशोककालीन स्तूप से संबंधित परंपराओं का उल्लेख मिलता है, लेकिन वर्तमान पुरातात्त्विक संरचना को सीधे सम्राट अशोक से जोड़ने के लिए अधिक ठोस स्थल-विशेष प्रमाण आवश्यक हैं।

ब्रह्मसरोवर के विकास से पुरातात्त्विक अवशेषों पर प्रभाव की भी जाँच हो

प्रकाशित शोध में ब्रह्मसरोवर के renovation के दौरान बौद्ध monastery के बड़े हिस्से के प्रभावित होने का उल्लेख किया गया है।

इस संबंध में श्री निमराजे ने मांग की कि पुराने—

नक्शे, renovation records, archaeological reports, photographs और field documentation

सार्वजनिक किए जाएँ, ताकि यह वैज्ञानिक रूप से निर्धारित किया जा सके कि समय के साथ पुरातात्त्विक संरचनाओं को कितना नुकसान हुआ।

पुराने संरक्षण संबंधी उल्लेखों की वर्तमान स्थिति से तुलना हो

कुछ प्रकाशित अध्ययनों में स्तूप की जीर्ण एवं उपेक्षित अवस्था तथा उसकी ईंट संरचना में क्षति का उल्लेख मिलता है। श्री निमराजे ने कहा कि ये पुराने scholarly observations हैं और इन्हें वर्तमान स्थिति का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।

इसलिए तत्काल नवीन वैज्ञानिक Conservation Audit कराया जाना आवश्यक है, जिससे वर्तमान स्थिति का वास्तविक मूल्यांकन हो सके।

पहले गैर-विनाशकारी वैज्ञानिक सर्वेक्षण, फिर आवश्यकतानुसार उत्खनन

श्री निमराजे ने सुझाव दिया कि स्थल पर किसी भी नए उत्खनन से पहले Ground Penetrating Radar (GPR), GIS Mapping, Photogrammetry, 3D Documentation जैसी गैर-विनाशकारी वैज्ञानिक तकनीकों का प्रयोग किया जाए।

इसके बाद विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर सीमित एवं नियंत्रित उत्खनन किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि पुरातात्त्विक विरासत की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

20 सूत्रीय मांग-पत्र

गोपाल किरन समाजसेवी संस्था की ओर से सरकार के समक्ष निम्न मांगें रखी गई हैं—

1. बौद्ध स्तूप का नवीनतम वैज्ञानिक Conservation Audit कराया जाए।
2. विस्तृत archaeological survey कराया जाए।
3. GPR एवं अन्य non-invasive technologies का उपयोग किया जाए।
4. पुराने excavation/clearance reports सार्वजनिक किए जाएँ।
5. 1994–95 के scientific clearance records जारी किए जाएँ।
6. 2010–13 के archaeological records सार्वजनिक किए जाएँ।
7. पुराने एवं वर्तमान photographs उपलब्ध कराए जाएँ।
8. स्थल की GIS boundary निर्धारित एवं चिह्नित की जाए।
9. अतिक्रमण की स्वतंत्र जाँच कराई जाए।
10. विशेषज्ञ पुरातत्व एवं संरक्षण समिति गठित की जाए।
11. हिंदी एवं अंग्रेजी में विस्तृत सूचना-पट्ट लगाए जाएँ।
12. स्थल पर Buddhist Stupa की स्पष्ट पहचान प्रदर्शित की जाए।
13. कुषाण–गुप्त–वर्धनकालीन कालक्रम की जानकारी प्रदर्शित की जाए।
14. ह्वेनसांग के विवरण को संदर्भ सहित प्रस्तुत किया जाए।
15. संभावित विहार क्षेत्र की स्वतंत्र वैज्ञानिक जाँच हो।
16. कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय को दीर्घकालीन research partner बनाया जाए।
17. Heritage Walk विकसित की जाए।
18. स्थल का Digital/3D Heritage Documentation कराया जाए।
19. महाभारत एवं बौद्ध—दोनों विरासतों को समान वैज्ञानिक दृष्टि से Heritage Circuit में शामिल किया जाए।
20. यदि जाँच में प्रशासनिक लापरवाही प्रमाणित हो तो संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी निर्धारित की जाए।

“इतिहास को प्रतिस्पर्धा नहीं, समग्रता चाहिए”

श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने कहा कि इस मांग का उद्देश्य किसी एक धार्मिक या सांस्कृतिक परंपरा को दूसरी के विरुद्ध खड़ा करना नहीं है।

“कुरुक्षेत्र की महाभारत से जुड़ी विरासत का संरक्षण भी होना चाहिए और थानेसर के बौद्ध पुरातात्त्विक अवशेषों का भी। कुषाणकालीन संरचनाएँ, गुप्तकालीन साक्ष्य, वर्धनकालीन स्थापत्य, बौद्ध स्तूप, संभावित विहार तथा अन्य पुरातात्त्विक परतें—ये सभी भारतीय इतिहास की साझा धरोहर हैं।”

उन्होंने कहा कि यदि किसी स्थल की आधिकारिक पहचान बौद्ध स्तूप के रूप में दर्ज है, तो उसकी पुरातात्त्विक कहानी भी उसी स्पष्टता के साथ जनता के सामने आनी चाहिए।

“हमारा प्रश्न किसी धर्म के पक्ष या विपक्ष का नहीं, बल्कि प्रमाणित इतिहास के संरक्षण और सार्वजनिक प्रस्तुति का है। जो प्रमाणित है, उसे पूरी तरह सामने लाया जाए, जो परिकल्पना है उसे परिकल्पना के रूप में बताया जाए और जहाँ प्रमाण अधूरे हैं वहाँ नई वैज्ञानिक जाँच कराई जाए।”

उन्होंने सरकार से मांग की कि कुरुक्षेत्र के बौद्ध स्तूप को केवल एक टीले या सीमित स्मारक के रूप में न देखकर “Thanesar Buddhist Archaeological Complex” के रूप में वैज्ञानिक रूप से विकसित करने की संभावनाओं पर विचार किया जाए।

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