अशफ़ाक कायमखानी, ब्यूरो चीफ, जयपुर (राजस्थान), NIT:

राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में लंबे समय से प्रभावी रहे जाट-मुस्लिम राजनीतिक गठबंधन में अब दरार के संकेत दिखाई देने लगे हैं। बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच अब राजपूत-मुस्लिम गठबंधन को लेकर सक्रिय प्रयास शुरू हो गए हैं, जिससे क्षेत्र की राजनीति में नई हलचल पैदा हो गई है।
स्वतंत्र पार्टी के कमजोर पड़ने के बाद शेखावाटी में जाट-मुस्लिम गठबंधन मजबूत होकर उभरा था और लंबे समय तक प्रभावी भी रहा। लेकिन हाल के वर्षों में कई प्रमुख जाट नेताओं के भाजपा में शामिल होकर चुनाव लड़ने से इस गठबंधन की एकजुटता प्रभावित होती नजर आ रही है।

ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो राजमाता गायत्री देवी की स्वतंत्र पार्टी के समय से ही शेखावाटी के मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव राजपूत नेतृत्व की ओर रहा। वर्ष 1967 में आलम अली खान फतेहपुर से विधायक बने, जबकि 1972 में मंडावा से एजाजनबी खान मामूली अंतर से चुनाव हार गए। इसके बदले मुस्लिम मतदाता राजपूत उम्मीदवारों का समर्थन करते रहे। 1979 के लोकसभा चुनाव में भी राजपूत-मुस्लिम गठजोड़ ने आंशिक सफलता हासिल की थी।
1980 में भाजपा के गठन और भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व के बाद राजपूत मतदाताओं का झुकाव भाजपा की ओर बढ़ा, जबकि मुस्लिम मतदाता लोकदल और कांग्रेस की ओर जाने लगे। इसी दौर में जाट-मुस्लिम गठबंधन मजबूत हुआ। समय के साथ भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में जाट नेताओं का प्रभाव बढ़ता गया और आज दोनों ही दल जाट उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने लगे हैं।
हालिया घटनाक्रम में चूरू से राहुल कस्वां का भाजपा छोड़कर कांग्रेस से चुनाव लड़ना और सांसद बनना भी इस बदलते समीकरण का संकेत माना जा रहा है। वहीं, राजपूत मतदाता खुद को भाजपा में अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिलने से असंतुष्ट महसूस कर रहे हैं।
इधर, झुंझुनूं जिले के उदयपुरवाटी विधायक एवं पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा पिछले एक दशक से मुस्लिम मुद्दों को लेकर सक्रिय रहे हैं। विभिन्न सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर उनका खुला समर्थन मुस्लिम समुदाय के बीच उनकी स्वीकार्यता को मजबूत करता है। हाल ही में इस्लामपुर गांव का नाम बदलने के प्रस्ताव के विरोध में उन्होंने 22 किलोमीटर लंबी पदयात्रा निकालकर अपनी सक्रियता का प्रदर्शन किया।

दूसरी ओर, झाझड़ निवासी इंजीनियर महावीर सिंह शेखावत ने ‘सहभागी’ संगठन के माध्यम से पिछले कुछ वर्षों में राजपूत और मुस्लिम समुदायों को साथ लाने के प्रयास तेज किए हैं। सालासर और दिल्ली में आयोजित सम्मेलनों के साथ ही चूरू के ददेरवा में आयोजित कार्यक्रमों में दोनों समुदायों की संयुक्त भागीदारी इस नए गठबंधन की दिशा में बढ़ते कदम मानी जा रही है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि ये प्रयास सफल होते हैं तो शेखावाटी और नागौर क्षेत्र की 31 विधानसभा सीटों और चार लोकसभा सीटों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, नागौर के सांसद और कुछ अन्य नेता अब भी जाट-मुस्लिम गठबंधन को बनाए रखने की कोशिशों में जुटे हैं।
कुल मिलाकर, शेखावाटी की राजनीति एक बार फिर नए सामाजिक और जातीय समीकरणों के दौर से गुजर रही है, जहां आने वाले चुनावों में इन गठबंधनों की भूमिका निर्णायक हो सकती है।

