रहीम शेरानी हिन्दुस्तानी, ब्यूरो चीफ, झाबुआ (मप्र), NIT:

पवित्र रमज़ान माह की शुरुआत 19 फरवरी, गुरुवार से हुई है। इस मुकद्दस महीने के अंतिम अशरे में इबादत का विशेष महत्व होता है। इसी दौरान शब-ए-कद्र और जुम्मतुल विदा (रमज़ान का आखिरी जुम्मा) की खास अहमियत बताई गई है।
बताया जा रहा है कि 16 मार्च के आसपास बड़ा रोजा और शब-ए-कद्र मनाई जाएगी तथा संभवतः 20 मार्च को ईद-उल-फितर मनाई जा सकती है। ईद-उल-फितर की नमाज के साथ ही समाज में अमन, चैन और भाईचारे का संदेश दिया जाएगा।
रमज़ान के अंतिम अशरे में शहर में इबादत का माहौल और अधिक बढ़ जाता है। मेघनगर के आलिम जुनैद साहब ने बताया कि पूरे रमज़ान में रोजे रखे जाते हैं। रोजे का मतलब केवल भूखे-प्यासे रहना नहीं है, बल्कि गुनाहों से खुद को बचाना भी है।
नूर-ए-मोहम्मदी मस्जिद के हाफ़िज़ रिजवान और मरकज़ मस्जिद मेघनगर (झाबुआ) के हाफ़िज़ मोहसिन पटेल ने बताया कि रमज़ान के महीने में मस्जिदों में नमाजियों की भीड़ बढ़ जाती है। खासकर अंतिम अशरे में लोग इबादतों की ज्यादा पाबंदी करते हैं।
तरावीह पढ़ना सुन्नत
मौलाना सलमान के अनुसार तरावीह की नमाज पढ़ना सुन्नत है। तरावीह में कलामुल्लाह शरीफ (कुरआन शरीफ) सुनना और पढ़ना भी सुन्नत माना जाता है। तरावीह की नमाज को क़यामुल्लैल भी कहा जाता है।
रमज़ान में चार चीज़ों की कसरत
हदीस के अनुसार रमज़ान में चार चीज़ों की कसरत करनी चाहिए। इनमें से दो चीजें अल्लाह को राजी करने के लिए हैं—कलिमा-ए-तय्यिबा और इस्तगफार की कसरत।
बाकी दो चीजें यह हैं कि जन्नत की दुआ मांगी जाए और जहन्नम की आग से पनाह मांगी जाए।
हदीस में यह भी बताया गया है कि जो व्यक्ति किसी रोजेदार को पानी पिलाता है, उसे कयामत के दिन हौज़-ए-कौसर से ऐसा पानी पिलाया जाएगा कि उसे जन्नत में दाखिल होने तक प्यास नहीं लगेगी।
एतिकाफ की फज़ीलत
मौलाना हाफ़िज़ मोहसिन पटेल के अनुसार एतिकाफ का मतलब रमज़ान के अंतिम दस दिनों में मस्जिद में इबादत की नीयत से ठहरना होता है। एतिकाफ करने वाले व्यक्ति को मोअतकिफ कहा जाता है। हनफी फिक्ह के अनुसार एतिकाफ की तीन किस्में होती हैं, जिनमें रमज़ान के अंतिम अशरे का एतिकाफ सुन्नत है।
शब-ए-कद्र की फज़ीलत
हदीस के मुताबिक शब-ए-कद्र बहुत बरकत वाली रात है। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया कि जो व्यक्ति शब-ए-कद्र में ईमान और सवाब की नीयत से इबादत करता है, उसके पिछले गुनाह माफ कर दिए जाते हैं।
जुम्मतुल विदा की तीन खासियतें
रमज़ान के आखिरी जुम्मे को जुम्मतुल विदा कहा जाता है। इसकी तीन विशेषताएं बताई गई हैं—
1. जुमे का दिन सैय्यदुल अय्याम यानी दिनों का सरदार माना गया है।
2. रमज़ान को सैय्यदुश्शुहूर यानी महीनों का सरदार कहा गया है।
3. रमज़ान का आखिरी जुम्मा अगले रमज़ान तक नहीं आता, इसलिए इस दिन इबादत का विशेष महत्व होता है।

