मेहलक़ा इक़बाल अंसारी, औरंगाबाद/मुंबई /बुरहानपुर (मप्र), NIT:
डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद के उर्दू विभाग के तत्वावधान में “ग़ैर-अफ़सानी उर्दू साहित्य: नए रुझान” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का सफल आयोजन किया गया। यह सेमिनार PM Usha Meru Scheme (Soft Component and Research Grant) के अंतर्गत संपन्न हुआ।
इस महत्वपूर्ण अकादमिक आयोजन में महाराष्ट्र उर्दू साहित्य अकादमी, मुंबई के चेयरमैन जनाब सैयद हसीन अख़्तर साहब ने विशेष अतिथि के रूप में शिरकत की और उनके कर-कमलों से सेमिनार का उद्घाटन किया गया। सेमिनार में मुख्य अतिथि के रूप में देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक हस्ती प्रोफेसर अबूबकऱ अब्बाद (अध्यक्ष, उर्दू विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रोफेसर मिथन कुमार (दिल्ली विश्वविद्यालय) उपस्थित रहे।
इसके अतिरिक्त डॉ. डी. जी. खेड़कर (डायरेक्टर, PM Usha, डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय) एवं डॉ. मोहम्मद नासिर बाग़बान (असिस्टेंट प्रोफेसर, उर्दू विभाग, मिलिया आर्ट्स, साइंस एंड मैनेजमेंट कॉलेज, बीड़) ने भी सेमिनार की शोभा बढ़ाई।
सेमिनार का उद्घाटन सत्र महाराष्ट्र उर्दू साहित्य अकादमी के चेयरमैन जनाब सैयद हसीन अख़्तर साहब की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत एम.ए. द्वितीय वर्ष के छात्र बिलाल अबुलहसन अत्तार की तिलावत-ए-क़ुरआन से हुई। इसके पश्चात एम.ए. प्रथम वर्ष के छात्र शेख़ इरफ़ान शेख़ हारून ने नात-ए-रसूल (स.अ.) प्रस्तुत कर वातावरण को रूहानी बना दिया।
उर्दू विभागाध्यक्ष प्रोफेसर कीर्ति मालनी जावले ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए सेमिनार के उद्देश्य और महत्व पर प्रकाश डाला। दिल्ली से पधारे मुख्य वक्ता प्रोफेसर अबूबकऱ अब्बाद ने अपना प्रभावशाली की-नोट भाषण (कुलीदी ख़ुत्बा) प्रस्तुत करते हुए कहा कि ग़ैर-अफ़सानी उर्दू साहित्य अतीत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालों में उर्दू अदब की रीढ़ की हड्डी की हैसियत रखता है।
उन्होंने यात्रा-वृत्तांत, पत्र-साहित्य एवं अन्य ग़ैर-अफ़सानी गद्य विधाओं के उदाहरणों के माध्यम से नए रुझानों को गहन अकादमिक दृष्टि से स्पष्ट किया।
विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर मिथन कुमार ने भी अपने विचार तर्कपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करते हुए ग़ैर-अफ़सानी उर्दू साहित्य की प्रासंगिकता और उपयोगिता पर प्रकाश डाला। वहीं सेमिनार के अध्यक्ष जनाब सैयद हसीन अख़्तर साहब ने इस महत्वपूर्ण विषय पर सेमिनार के आयोजन के लिए उर्दू विभाग एवं प्रोफेसर कीर्ति मालनी जावले को बधाई दी और भविष्य में अकादमी की ओर से छात्रों एवं शोधार्थियों को हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया।
उद्घाटन सत्र का संचालन सेमिनार संयोजक डॉ. शेख़ असगर ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सैयद सुहैल हाशमी ने प्रस्तुत किया।
सेमिनार का तकनीकी सत्र प्रोफेसर अबूबकऱ अब्बाद, प्रोफेसर मिथन कुमार एवं डॉ. अतीक़ अहमद क़ुरैशी की अध्यक्षता में संपन्न हुआ, जिसमें लगभग 16 शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए।
सभी अध्यक्षों ने शोध-पत्रों की सराहना करते हुए अपने बहुमूल्य विचार व्यक्त किए। इस सत्र का संचालन डॉ. नूरजहाँ शेख़ ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन पीएच.डी. शोधार्थी अज़हर बशीर ने दिया।
समापन सत्र की अध्यक्षता उर्दू विभागाध्यक्ष प्रोफेसर कीर्ति मालनी जावले ने की। इस अवसर पर प्रोफेसर अबूबकऱ अब्बाद और प्रोफेसर मिथन कुमार ने सेमिनार की सफलता पर विभाग को बधाई दी।
चिश्तिया कॉलेज की प्राचार्य प्रोफेसर आसिफ़िया ज़करिया ने कहा कि ऐसे सेमिनारों का आयोजन आसान नहीं होता और यह कार्यक्रम ग़ैर-अफ़सानी साहित्य पर कार्य करने वालों के लिए नए द्वार खोलेगा।
अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रोफेसर कीर्ति मालनी जावले ने कहा कि यह सेमिनार शोध और आलोचना के नए आयाम स्थापित करेगा तथा आने वाले शोधार्थियों और उर्दू प्रेमियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा।
उन्होंने भविष्य में भी ऐसे अकादमिक आयोजनों की निरंतरता बनाए रखने का भरोसा दिलाया। समापन सत्र का संचालन डॉ. रिज़वाना रहबर ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन सेमिनार संयोजक डॉ. शेख़ असगर ने प्रस्तुत किया।

