सीकर जिला में पंचायत व स्थानीय निकाय चुनावों से पहले बदले सियासी समीकरण, परिसीमन व SIR से बढ़ी दलों की बेचैनी | New India Times

अशफ़ाक़ क़ायमखानी, ब्यूरो चीफ, जयपुर (राजस्थान), NIT:

सीकर जिला में पंचायत व स्थानीय निकाय चुनावों से पहले बदले सियासी समीकरण, परिसीमन व SIR से बढ़ी दलों की बेचैनी | New India Times

राजस्थान में पंचायत एवं स्थानीय निकाय संस्थाओं में प्रशासक राज लागू होने के बाद अब वार्ड, पंचायत, पंचायत समिति और स्थानीय निकायों के नए सिरे से हुए परिसीमन ने संभावित उम्मीदवारों की राजनीतिक गणित बिगाड़ दी है। आगामी चुनावों को लेकर जिले में नए सियासी समीकरण बनते नजर आ रहे हैं।
भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में कुछ दिग्गज नेताओं द्वारा अपने पुत्र-पुत्रियों को राजनीति में स्थापित करने की मंशा को लेकर वर्षों से राजनीतिक विरोधी रहे नेता भी अब एक-दूसरे के साथ खड़े दिखाई दे सकते हैं। इससे परंपरागत राजनीतिक दुश्मनियों के समीकरण बदलने की संभावना है।
परिसीमन और SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) को लेकर कांग्रेस नेताओं ने प्रशासन पर भाजपा के दबाव में काम करने के आरोप लगाए हैं। वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिसीमन और SIR का सीधा लाभ भाजपा को मिल सकता है। जिले के कुछ हिस्सों में माकपा का भी पारंपरिक प्रभाव रहा है।

सीकर जिला में पंचायत व स्थानीय निकाय चुनावों से पहले बदले सियासी समीकरण, परिसीमन व SIR से बढ़ी दलों की बेचैनी | New India Times

सीकर माकपा के शीर्ष नेताओं, सांसद एवं पोलित ब्यूरो सदस्य कामरेड अमरा राम तथा राज्य कमेटी सचिव कामरेड किशन पारीक का गृह जिला है। दोनों ही सरपंच रह चुके हैं। कामरेड अमरा राम ने पूर्व में पार्टी के दम पर कई बार लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन सफलता उन्हें इंडिया गठबंधन के तहत कांग्रेस के सहयोग से मिली। यदि पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों में माकपा-कांग्रेस गठबंधन होता है तो दोनों की स्थिति मजबूत हो सकती है, अन्यथा भाजपा सत्ता के बल पर बढ़त बना सकती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा सरकार के प्रति नाराजगी तो है, लेकिन परिसीमन से स्थानीय निकायों का स्वरूप बदलने के कारण कांग्रेस पहले की तुलना में कमजोर नजर आ रही है। विशेषकर पंचायत चुनावों में प्रधान और जिला प्रमुख को लेकर भाजपा के भीतर भी अलग-अलग गुटों के गठबंधन बनते दिखेंगे।

सीकर जिला में पंचायत व स्थानीय निकाय चुनावों से पहले बदले सियासी समीकरण, परिसीमन व SIR से बढ़ी दलों की बेचैनी | New India Times

धोद पंचायत समिति और धोद नगरपालिका पर माकपा की खास नजर है। यदि माकपा-कांग्रेस गठबंधन होता है तो यहां प्रधान और चेयरमैन पद माकपा के खाते में जा सकते हैं। धोद नगरपालिका माकपा राज्य सचिव किशन पारीक का गृह क्षेत्र है, जबकि धोद पंचायत समिति सांसद अमरा राम का इलाका है—ऐसे में दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।
कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष एवं लक्ष्मणगढ़ विधायक गोविंद डोटासरा के विधानसभा क्षेत्र में लक्ष्मणगढ़, नेछवा और नवगठित बलारा पंचायत समिति के साथ लक्ष्मणगढ़ नगरपालिका शामिल है। बलारा नई पंचायत समिति बनी है। लक्ष्मणगढ़ और नेछवा में वर्तमान में कांग्रेस के प्रधान हैं, हालांकि पूर्व में भाजपा ने अधिक डायरेक्टर जिताए थे। सत्ता के बल पर कांग्रेस प्रधान बनाने में सफल रही थी, जिसको लेकर न्यायालय में मामला लंबित है।
अब सत्ता भाजपा के पास है। ऐसे में भाजपा नेता भागीरथ गोदारा, जिन्हें सुभाष महरिया का समर्थन प्राप्त है, बलारा पंचायत समिति में अपनी संगठनात्मक ताकत दिखा सकते हैं। इसके विपरीत, गोविंद डोटासरा पूरी कोशिश करेंगे कि भाजपा यहां प्रधान न बना सके।

सीकर जिला में पंचायत व स्थानीय निकाय चुनावों से पहले बदले सियासी समीकरण, परिसीमन व SIR से बढ़ी दलों की बेचैनी | New India Times

सांसद अमरा राम के लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत के बाद उनका शहरी और ग्रामीण मतदाताओं पर प्रभाव बढ़ा है। उनकी साफ-सुथरी और संघर्षशील छवि का लाभ माकपा को मिल सकता है। वहीं डोटासरा के लिए जिले और अपने विधानसभा क्षेत्र में प्रधान व चेयरमैन बनवाना इस बार आसान नहीं होगा।
परिसीमन के बाद बनते नए समीकरणों से यह भी संकेत मिल रहे हैं कि कई नेता वर्षों की राजनीतिक दुश्मनी भुलाकर अपने परिजनों को स्थापित करने के लिए आपसी गठजोड़ कर सकते हैं। यह भी संभावना जताई जा रही है कि रीटा सिंह के बाद एक बार फिर किसान बिरादरी का जिला प्रमुख बन सकता है।
कुल मिलाकर, पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद डोटासरा, मंत्री झाबर सिंह खर्रा, भाजपा नेता सुभाष महरिया, प्रेम सिंह बाजोर और सांसद अमरा राम, सभी की प्रतिष्ठा दांव पर होगी। परिसीमन और SIR की तरह भाजपा को सत्ता का लाभ चुनावों में भी मिल सकता है।

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