अतीश दीपंकर ब्यूरो चीफ, पटना (बिहार), NIT:

पटना के कदमकुआं स्थित बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन में योग वेदांत सेवा समिति द्वारा तुलसी पूजन दिवस धूमधाम से मनाया गया। यह आयोजन पूज्य संत श्री आशारामजी बापू की पावन प्रेरणा से, योग वेदांत सेवा समिति के तत्वावधान में एक जन-जागरण अभियान के रूप में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में सैकड़ों विद्यार्थी, युवा, गृहिणियाँ, वृद्धजन और गणमान्य नागरिकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

कार्यक्रम के दौरान वैदिक मंत्रोच्चार के साथ तुलसी माता का विधिवत पूजन किया गया। मौके पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने तुलसी माता की पूजा-अर्चना की। इस अवसर पर मां तुलसी जी को तिलक लगाया गया, अगरबत्ती दिखाई गई और प्रसाद अर्पित किया गया। नियमबद्ध पूजा के बाद तुलसी माता की आरती की गई।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पटना की महापौर सीता साहू ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि तुलसी पूजन केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, स्वास्थ्य और पर्यावरण से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्होंने पूज्य संत श्री आशारामजी बापू के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए इस परंपरा को जन-आंदोलन का स्वरूप देने की आवश्यकता पर बल दिया।
इस अवसर पर पटना आश्रम के महंत नरेंद्र ब्रह्मचारी ने कहा कि पूज्य संत श्री आशारामजी बापू की प्रेरणा से आज विश्वभर में 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस के रूप में मनाया जाता है। पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव से युवा पीढ़ी को बचाने और भारतीय सनातन मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए वर्ष 2011 में इस पर्व की शुरुआत की गई थी, जो अब एक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है।
महंत नरेंद्र ब्रह्मचारी ने तुलसी के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि घर में तुलसी का पौधा कल्याणकारी होता है और धन-धान्य एवं पुण्यफल प्रदान करता है।
उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म में प्रातःकाल तुलसी दर्शन से स्वर्ग के समान पुण्यफल प्राप्त होता है। तुलसी की लकड़ी से बनी माला धारण कर भगवान विष्णु की पूजा करने से दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। तुलसी माला को भगवान विष्णु को अर्पित कर पुनः प्रसाद रूप में धारण करने से पापों का नाश होता है।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित विद्यार्थियों और गुरुजनों ने संकल्प लिया कि वे प्रत्येक वर्ष 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस मनाएंगे और समाज में इसके महत्व का व्यापक प्रचार-प्रसार करेंगे, ताकि भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं को नई पीढ़ी तक सशक्त रूप से पहुँचाया जा सके।

