मेहलक़ा इक़बाल अंसारी, ब्यूरो चीफ, बुरहानपुर (मप्र), NIT:
मुंबई की उर्दू कारवां नामक संस्था और उसके कर्ताधर्ता जनाब फ़रीद अहमद खान उर्दू साहित्य जगत में किसी परिचय के मोहताज नहीं है। उर्दू भाषा के प्रचार और प्रसार में उर्दू कारवां नामक संस्था और इसके सदस्यों की सेवाओं से उर्दू जगत भली भांति परिचित है।
उर्दू ज़बान की तरक़्क़ी, उसके तहज़ीबी व अदबी उसूलों की पासदारी, तथा नौ वर्षों से लगातार आयोजन और अदबी सेवाओं की बे-लौस मिसाल पेश करने वाला “उर्दू कारवां” इस वर्ष अपने 9वें अशरा-ए-उर्दू का आग़ाज़ 22 नवंबर से 5 दिसंबर 2025 तक कर रहा है।
उर्दू कारवां ने अपना 10 दिवसीय विस्तृत कार्यक्रम सोशल मीडिया के माध्यम से प्रदर्शित कर दिया है। संस्था के जुनूनी अध्यक्ष फ़रीद अहमद ख़ान ने एक बार फिर शहर में अदबी रौनक बिखेरने का इंतज़ाम किया है, जिसकी झलक उनके शिद्दत और उर्दू से प्रेम और लगन का इशारा देती है।
इस अवसर पर जारी दावत–नामा के मुताबिक़, अशरा-ए-उर्दू का पहला कार्यक्रम एक इल्मी व अदबी परिचर्चा (Panel Discussion) का आयोजन अंजुमन इस्लाम मुंबई के माननीय अध्यक्ष पद्मश्री डॉ ज़हीर क़ाज़ी साहब की सदारत में अहमद ज़कारिया ऑडिटोरियम, अंजुमन इस्लाम हेड ऑफिस केंपस सीएसएमटी मुंबई में दोपहर 3:00 बजे से उर्दू ज़बान की तरक्क़ी और बक़ा: तजावीज़ और नफ़ाज़ के उन्वान (शीर्षक) पर किया गया है। अर्थात उर्दू भाषा की तरक़्क़ी और अस्तित्व: चुनौतियाँ, सुझाव और संभावनाएँ)
इस अदबी मज़ाकरा(परिचर्चा) में शामिल होने वाले महत्वपूर्ण नाम में सर्वश्री (1) इक़बाल बरकी मालेगांव (2) डॉक्टर मुजाहिद नदवी असिस्टेंट प्रोफेसर महाराष्ट्र कॉलेज मुंबई और डॉक्टर बेगम रेहाना अहमद एग्जीक्यूटिव चेयरपर्सन गर्ल्स बोर्ड अंजुमन इस्लाम इसमें भाग लेकर अपने विचार प्रकट करेंगे।
उपरोक्त नामों के होने से यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यह परिचर्चा निश्चित रूप से तामीरी (constructive) होगी, जिसमें उर्दू की मौजूदा सूरत-ए-हाल, उसके सामने खड़ी तालीमी–तर्जुहाती मुश्किलात, और भविष्य की नीतियों पर वाजेह तजावीज़ पेश की जाएँगी।
उर्दू कारवां के जुमला जिम्मेदारों की जानिब से जनाब फरीद अहमद खान ने शहर के सभी अदब-नवाज़, तालीमी हस्तियाँ, और उर्दू के चाहने वालों को इस फ़िक्रअंगेज़ बैठक़ में शिरकत की दावत दी गई है।
नौ वर्षों की लगन — फ़रीद अहमद ख़ान का अदबी सफ़र
उर्दू कारवां के सदर फ़रीद अहमद ख़ान की नौ वर्षीय निरंतर सेवाएँ आज उर्दू जगत में एक मिसाल बन चुकी हैं। चाहे अशरा-ए-उर्दू के सालाना आयोजन हों, स्कूल–कॉलेजों में उर्दू की सरगर्मी बढ़ाना हो, या शहर की अदबी फ़ज़ा को ज़िंदा रखना — फ़रीद अहमद खान साहब ने अपने अमल से यह साबित किया है कि उर्दू सिर्फ़ ज़बान नहीं, बल्कि तहज़ीब, इंसानियत और मिल्लत का पुल है।उनकी सरगर्मी और सलीक़े से किए गए प्रबंधन ने उर्दू कारवां को शहर का एक भरोसेमंद अदबी मंच बना दिया है।

