व्यर्थ का प्रकरण लगाने पर तृतीय व्यवहार न्यायाधीश के न्यायालय ने ₹ 56,000/- हर्जाना देने का दिया आदेश | New India Times

मेहलक़ा इक़बाल अंसारी, ब्यूरो चीफ, बुरहानपुर (मप्र), NIT:

व्यर्थ का प्रकरण लगाने पर तृतीय व्यवहार न्यायाधीश के न्यायालय ने ₹ 56,000/- हर्जाना देने का दिया आदेश | New India Times

बुरहानपुर जिला न्यायालय के तृतीय व्यवहार न्यायाधीश महोदय (पी.अ.श्रीमती सरिता जतारिया) के न्यायालय ने व्यर्थ का प्रकरण लगाने पर हुना V/S विनोद के मामले में वादीगण के विरुद्ध कुल 56,000.00 ₹ का हर्जाना देने का आदेश दि.13.05.2025 को जारी किया है।

उल्लेखनीय है कि वादीगण ने प्रकरण लगाने के बाद एवं न्यायालय से प्रतिवादिगण को नोटिस जारी होने के उपरांत, जब प्रतिवादिगण अधिवक्ता के माध्यम से प्रकरण में उपस्थित हो गए तो इस स्तर पर वादीगण ने ₹ 10/-  का टिकट लगाकर अपना वाद / केस वापस लेने का आवेदन दिया , जिसमें मा. न्यायालय ने सभी प्रतिवादियों को कुल रु. 56,000/- (प्रत्येक को रु. 2,000/-) हर्जाना देने का आदेश देने का आदेश जारी किया।

प्रतिवादी क्रमांक 1 की ओर से पैरवी कर रहे हैं वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मनोज कुमार अग्रवाल ने बताया कि मा. न्यायालय ने उक्त आदेश उनकी आपत्ति/आवेदन पर जारी किया है । श्री अग्रवाल ने बताया कि अक्सर देखने में आता है कि कुछ वादीगण रु.1,000 –  रु 2,000 की कोर्ट फीस भरकर एवं कई लोगों को प्रतिवादी बनाकर न्यायालय में व्यर्थ के प्रकरण लगा देते हैं और फिर ऐसे व्यर्थ के प्रकरण में प्रतिवादी अपने-अपने अधिवक्ता के माध्यम से उपस्थित भी हो जाते हैं।

कई मामलों में ऐसे प्रकरण सालों साल चलते रहते हैं और वे पक्षकार चलाते रहते है, जिसमें प्रतिवादिगण का न केवल समय बल्कि वर्तमान महंगी कानूनी प्रक्रिया के चलते लाखों रुपया खर्च होता रहता है और अंततः या तो ऐसे प्रकरण निरस्त हो जाते हैं या वादी स्वयं ही ऐसे प्रकरणों को वापस ले लेते हैं । जबकि इस संपूर्ण कानूनी प्रक्रिया में सरकार का लाखों करोड़ों रुपया जजों की सैलरी एवं अन्य खर्चे/न्यायालय के पीछे खर्च होता रहता है।

साथ ही साथ प्रतिवादीगणों को भी महंगी कानूनी प्रक्रिया के चलते वकीलों में और अन्य खर्चों में लाखों रुपया खर्च लगाना होता है , जो कि पूरी तरह देश का ही नुकसान होता है । ऐसी स्थिति में उक्त माननीय तृतीय व्यवहार न्यायाधीश महोदय का उक्त फैसला दि. 13.05.2025 अपने आप में महत्वपूर्ण फैसला है जो ऐसे व्यर्थ के प्रकरणों को लगाने वाले पक्षकारों को एक कड़ा सबक/संदेश भी है।

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