रहीम शेरानी हिन्दुस्तानी, ब्यूरो चीफ, झाबुआ (मप्र), NIT:

रमज़ान का महीना अल्लाह की अनगिनत रहमतों बरकतों और मगफिरत माफ़ी का प्रतिक है। रोज़ा केवल भुखे प्यासे रहने का नाम नहीं है बल्कि यह एक आध्यात्मिक तपस्या है जिसमें इन्सान अपनी तमाम इच्छाओं पर नियंत्रण रखता है रोज़ा इन्सान को बुरी आदतों से दुर रखता है और उसके दिल को पाक व साफ करता है। रमज़ान न केवल आत्म संयम और धैर्य की परिक्षा लेता है बल्कि यह इन्सान को अल्लाह के करीब लाने का जरिया भी है।
रमज़ान की फजीलत महत्व क़ुरान शरीफ़ में और हदीस में वर्णित है रमज़ान की सबसे बड़ी फजीलत यह है कि इसी महीने में पवित्र कुरान का आसमान से अवतरित हुआ अल्लाह फ़रमाता है रमज़ान वह महीना है जिसमें क़ुरान नाजिल किया गया जो लोगों के लिए मार्गदर्शन और सत्य को स्पष्ट करने वाला है इस महीने में रोज़ा उपवास रखना हर मुसलमान पर फर्ज अनिवार्य किया गया है बकौल कुरान रोज़ा तुम पर अनिवार्य किया गया है ताकि तुम परहेजगार बनो। रोज़ा आत्म संयम ईमान और तक्वा परहेजगारी की परिक्षा है रोजेदार न सिर्फ अपने नफ्स इच्छाओं पर नियंत्रण रखता है बल्कि अपने विचारों और कामों को भी शुद्ध करता है ।

