अशफ़ाक क़ायमखानी, ब्यूरो चीफ, जयपुर (राजस्थान), NIT:

हालांकि झुंझुनूं विधानसभा क्षेत्र में दादा शीशराम ओला-बेटा विजेंद्र ओला व पोता अमित ओला को कांग्रेस द्वारा लगातार एक के बाद एक को झूंझुनू उम्मीदवार बनाये जाने से अन्य राजनीतिक कार्यकर्ताओ को टिकट मिलने की सम्भावना क्षीण होने से उनके मनों में अलग तरह की शंकाओं व आशंकाओं का पैदा होना आम बात है। इसी के चलते 2023 में कांग्रेस की टिकट पर विधायक बने विजेंद्र ओला के 2024 में सांसद बनने से रिक्त हुई सीट पर हो रहे उपचुनाव कांग्रेस हाईकमान से मुस्लिम समुदाय ने भी टिकट की मांग की। हमेशा की तरह मुस्लिम समुदाय की टिकट की मांग को हाईकमान ने सिरे से खारिज करते हुये मरहूम शीशराम ओला के पोते व विजेंदर ओला के बेटे अमित ओला को टिकट मिलने पर मुस्लिम समुदाय ने ईदगाह मैदान में मुस्लिम महापंचायत आयोजित करके उम्मीदवार अमित ओला व उनके पिता सांसद विजेंद्र ओला के खिलाफ शोला ब्यानी करके एक तरह से उनके बजाय किसी अन्य उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने के संकेत दिये।
मुस्लिम महापंचायत आयोजित होने से पहले इसी तरह की एक अन्य महापंचायत 12 अक्टूबर को मुस्लिम को टिकट देने की मांग जौर शौर से उठाने को लेकर भी हुई थी। जिसमें ओला की उम्मीदवारी के खिलाफ के बीज बोये गये थे। लेकिन कल की महापंचायत में आयोजकों द्वारा कोई ठोस फैसला नहीं लेने पर दर्शकों व आम मतदाताओं में निराशा का भाव आना देखा गया। पंचायत को सम्बोधित करने वालों खास लोगों में राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढी व मंडावा विधायक रीटा सिंह व उपचुनाव मे निर्दलीय उम्मीदवार राजेन्द्र गुढा के समर्थक थे।
झुंझुनूं सहित शेखावाटी जनपद के साथ साथ जयपुर राजघराने के राजकीय क्षेत्र में 1979-80 के पहले राजनीतिक तौर पर मुस्लिम व राजपूत गठजोड़ बना रहता था। जब खासतौर मुस्लिम समुदाय की कायमखानी बिरादरी व राजपूत दोनों मिलकर अपने प्रभाव वाले मतों को लेकर राजनीतिक गठजोड़ बनाकर विधायक व सांसद बनते व चुनाव लड़ते थे। 1980 के बाद जनपद में जाट व मुस्लिम का राजनीतिक गठजोड़ होता नजर आया। लेकिन कुछ सालों से अब जाट-मुस्लिम गठजोड़ में दरार पड़ती साफ नज़र आ रही है। पीछले दस सालों में इनमें राजनीतिक टकराव देखने को मिल रहा है। 1979 के लोकसभा चुनाव में राजपूत-मुस्लिम के गठजोड़ से झूंझुनू से भीमसिंह मंडावा जनता पार्टी के हलधर निशान पर चुनाव जीत कर सांसद बने वहीं चूरु से इसी चुनाव में आलम अली खां कांग्रेस उम्मीदवार चंदनमल वैध को काफी पीछे छोड़ते हुये लोकदल उम्मीदवार दौलतराम सारण से मामूली अंतर से चुनाव हार गये। 1980 में भाजपा के गठन के बाद भैरोंसिंह शेखावत का भाजपा नेता के तौर पर राजपूत बिरादरी पर पकड़ मजबूत होती गई त्यो त्यो मुस्लिम-राजपूत गठजोड़ कमजोर होता गया। स्वतंत्र पार्टी की नेता महारानी गायत्री देवी की राजनीतिक पकड़ भी उसी समय कमजोर होने से भाजपा नेता भैरोंसिंह शेखावत का अपनी बिरादरी पर प्रभाव बढने लगा। पिछले कुछ महीनों में झूंझुनू जिले में मुस्लिम युवकों की हत्या होने व झूंझुनू सभापति नजमा के ससूर की बिल्डिंग को तोड़ने की कोशिश सहित अनेक मौकों पर पूर्व मंत्री राजेन्द्र गुढा के खड़े होने से मुस्लिम समुदाय का एक तबका उसका दिवान होता नज़र आ रहा है। टिकट ना मिलने की नाराज़गी में इस तरह मामलों ने आग में घी डालने का काम किया है। जिसके चलते गुढा के प्रयास से राजपूत-मुस्लिम गठजोड़ की नींव फिर पड़ती नज़र आ रही है।
कुल मिलाकर यह है कि 12 अक्टूबर व 28 अक्टूबर को झूंझुनू जिला मुख्यालय पर ईदगाह मैदान में आयोजित मुस्लिम महापंचायत में वक्ताओं द्वारा ओला परिवार की उम्मीदवारी व मुस्लिम को टिकट नहीं मिलने को लेकर की गई शोला ब्यानी से संकेत मिलता है कि इस पंचायत के प्रभाव में आने वाले मतदाताओं का समर्थन निर्दलीय उम्मीदवार पूर्व मंत्री राजेंद्र गुढा को मिल सकता है। उस स्थिति में भाजपा उम्मीदवार राजेन्द्र भामू व कांग्रेस उम्मीदवार अमित ओला एवं राजेन्द्र गुढा के मध्य कड़ा मुकाबला हो सकता है। गुढा जाति से राजपूत व ओला व भामू जाट जाति से तालूक रखते हैं। कांग्रेस ने 1993 में तत्तकालीन विधायक शीशराम ओला के सांसद बनने पर उनके बेटे विजेंदर ओला को टिकट दी थी एवं 2024 में झूंझुनू के तत्तकालीन विधायक विजेंद्र ओला के सांसद बनने पर रिक्त हुई सीट पर उनके पूत्र अमित ओला को उम्मीदवार बनाया है। 1993 के उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार विजेंद्र ओला भाजपा उम्मीदवार डा. मूलसिंह शेखावत से चुनाव हार गये थे। अब 2024 के उपचुनाव में परिणाम क्या आता है वो देखना होगा।

