मेहलक़ा इक़बाल अंसारी, ब्यूरो चीफ, बुरहानपुर (मप्र), NIT:

30 करोड़ रुपए की लागत से निर्मित ज़िला चिकित्सालय में सुविधा के अभाव में एवं आए दिन होती मौत के संदर्भ में इसे ज़िंदा लाशों का क़ब्रिस्तान के नाम से जाना जाता है। इस ज़िला चिकित्सालय में यहां पर पदस्थ स्टाफ की लापरवाही से गुरुवार को एक प्रसूता की मौत होने से परिजनों ने आपा खोकर जमकर हंगामा किया, जिसके कारण पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। हंगामा के कारण प्रसूता वार्ड में दरवाजे का कांच भी फूट गया। प्रसूता के परिजनों ने डॉक्टर सहित स्टाफ पर इलाज में लापरवाही का इल्ज़ाम लगाया है। ज़िला चिकित्सालय बुरहानपुर के आरएमओ डॉक्टर भूपेंद्र गौर ने मीडिया के कैमरे के सामने खुद अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही को स्वीकार किया है। लेकिन उक्त स्वीकारोक्ति से क्या होता है ? मरीज़ की जान तो जा चुकी है। जो अब वापस नहीं आना है। अस्पताल में हुई लापरवाही और मौत का यह कोई पहला मामला नहीं है। साल में कई बार ऐसे मामले होते रहते हैं। अस्थाई रूप से हंगामे भी होते रहते हैं। लेकिन बाद में मामले ठंडे पड़ जाते हैं या ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। क्योंकि क़ानून की मज़बूत गिरफ्त अधिकारियों / कर्मचारियों पर नहीं होने के कारण और क़ानून के तहत काउंटिबिलिटी की जिम्मेदारी फिक्स नहीं होने से ऐसे कर्मचारी जांच में बच निकलते हैं। इतिहास गवाह है कि एक भी कर्मचारी पर कानून के तहत कोई कार्रवाई आज तक नहीं हुई है। अभी कुछ दिनों पूर्व कलेक्टर बुरहानपुर ने हॉस्पिटल की अवस्थाओं पर अपर कलेक्टर बुरहानपुर के माध्यम से शिकंजा कसा था तो अस्पताल के डॉक्टर्स ने इसे अना का मसला मानकर हड़ताल की चेतावनी दी थी जिसके कारण अव्यवस्थाएं पूर्व की तरह आज भी बरक़रार हैं। इससे गरीब लोगों की जान जा रही है। अमीर लोग तो बड़े अस्पताल में इलाज करा कर सुखी हैं।
