जामनेर निगम की लापरवाही: आवारा जानवरों से लोग परेशान, बैनरों पर तक सिमटा विपक्ष? | New India Times

नरेंद्र इंगले, ब्यूरो चीफ, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:

जामनेर निगम की लापरवाही: आवारा जानवरों से लोग परेशान, बैनरों पर तक सिमटा विपक्ष? | New India Times

बीते पांच सालों के भीतर बारामती (शरद पवार का गृह शहर) की तरह बनते रह गया जामनेर शहर सूबे की सत्ता में रहने के बावजूद भी विकास को लेकर मुफलिसी का शिकार लग रहा है। परिघि की बात करें तो मध्य से महज 2 किमी के दायरे के अंदर खत्म होती जामनेर की रचना अपने आप में अनुसंधान का विषय हो सकता है बशर्ते शायद ही कोई स्कॉलर इस पर विचार करे इस बात की कोई गारंटी नहीं दी जा सकती है। टूटी सड़कों के कारण उपजी धूल मिट्टी से सर्दी-जुकाम, बुखार जैसी संक्रामक बीमारियां, मलेरिया टायफाइड की शक्ल ले लेती है और अस्पताल के बेड हमेशा मरीजों से पटे पड़े रहते हैं। इसी की चपेट में आए 18 महीने के जीशान को शरीर में पानी की कमी और दस्त की शिकायत के चलते निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टर ने जीशान के अभिभावकों से कहा कि बच्चे को 2 से 3 दिन तक एडमिट रखना पड़ेग। बेटे की स्वास्थ सलामती के लिए जीशान के पिता आरिफ खान जो कि कटलरी की छोटी सी दुकान चलाते हैं ने खर्चे की परवाह नहीं की और बच्चे को निजी अस्पताल में भर्ती कराया, उनकी जगह पर हर कोई पिता यही करता। दवा-दारू के बाद मां जब जीशान को अस्पताल के बाहर के प्रांगण में लेकर कुछ पल सुकून से बैठी ही थी कि तभी बच्चे को लूजमोशन हो गया। मां ने सड़क किनारे खुली जगह पर बच्चे को शौच के लिए बिठाया ही था कि अचानक पीछे से आए सुअर ने जीशान पर हमला कर दिया जिसमें उसके पैरों पर काटने की गंभीर चोटे आई हैं। इस हादसे में गहरी चोट के कारण जीशान का पैर बुरी तरह सूझ गया जिस के बाद उसे सरकारी दवाखाने से टीका दिया गया। कटलरी की दुकान चलाने वाले आरिफ खान के इस दुखड़े जैसे ही कई दर्द हैं जो स्थानीय निकाय की लापरवाही से उपजते हैं और मीडिया में खबरें भी चलती हैं लेकिन प्रशासन से होता कुछ नहीं है। बीते कई सालों से जामनेर की सड़कों पर आवारा जानवर जैसे कुत्ते, सुअर का उत्पात इतना बढ़ गया है कि आए दिन वाहनों के हादसे होते रहते हैं। आवारा जानवरों की दहशत इतनी है कि रिहायशी इलाकों में बच्चों का खेलना कूदना तक मुश्किल हो गया है। कब किसके साथ हादसा हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। किसी जमाने में जब ग्राम पंचायत थी तब आवारा जानवरों को लेकर प्रशासन सतर्क था पर निगम बनने के बाद से वैसी मुश्तैदी गायब हो गई है। विपक्ष की बात करें तो वह उनके पार्टी बैनरों तक ही सिमट कर रह गया है जो केवल मुख्य सड़कों की शोभा को बिगाड़ता है। प्रबंधन को लेकर लोग आलोचना में बोलते तो खूब हैं लेकिन उनकी आवाज को बुलंद करने वाला विपक्ष चुनावी साल में ही सड़कों की शान बढ़ाता है। खैर सत्तापक्ष से जनता का यही अनुरोध है कि कम से कम आवारा पशुओं के आतंक से निजाद दिलाई जाए।

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