संदीप शुक्ला, ग्वालियर ( मप्र ), NIT;

शिक्षक नहीं पढ़ पाए हिंदी, शिक्षामंत्री ने पकड़ा सिर, आज हर समाचार पत्र की यह सुर्खी है।
- कुछ प्रश्न आदरणीय शिक्षा मंत्री और अन्य नीति निर्धारक राजनीतिज्ञ महानुभाव से:-
पहला प्रश्न जिस शिक्षक को पढ़ना नहीं आता उसकी नियुक्ति किसने की ?
- जिस राज्य में M B B S की डिग्री फर्जी मिल सकती उस राज्य में B A, B Ad की फर्जी डिग्री मिलना कोन सी बड़ी बात हैं ?
आज से लगभग 10 वर्ष पूर्व मध्यांह भोजन व्यवस्था नहीं थी तब प्रदेश में सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या जो थी उससे आज लगभग 20% बच्चे कम हैं, फिर ऐसी योजना क्यों ?
बच्चों की अनुपस्थिति पर नाम नहीं काट सकते, उसे फ़ेल नहीं कर सकते, बच्चा सिर्फ परीक्षा के दिन आ जाये तो पास कर दो, तो फिर हिंदी पढ़ना कहाँ से आएगी ?
बच्चों से शिक्षक की कोई दुश्मनी नहीं होतीं है। अगर बच्चे की भलाई के लिए सख्ती की जाती हैं तो शिक्षक को दण्डित किया जाता हैं , क्यों ?
जो शिक्षक अच्छा कार्य करते हैं उन्हें कोई पुरष्कृत नहीं किया जाता और अच्छा कार्य ना करने वाले को कभी दण्डित नही किया जाता , क्यों ?
प्राथमिक विद्यालय के गरीब बच्चों को निजी स्कूलों में 25% भर्ती अनिवार्य कर दी हैं। जब प्राथमिक से बच्चे माध्यमिक में ही नहीं आएंगे तो सरकारी स्कूलों में बच्चे कहाँ से आएंगे ?
आरक्षण की नीति के कारण जिन बच्चों को शिक्षकों ने पढ़ाया था, वही बच्चा उसी शिक्षक का प्राचार्य बन कर उसी स्कूल में आ गया, ऐसा क्यों ?
शिक्षा विभाग को एक प्रयोगशाला बना दिया गया । देश आज़ाद होने के बाद पास-फ़ैल कार्ड का प्रारूप तक हम नही बना पाये।
पिछले 10 वर्षों में शिक्षकों का जितना वेतन बड़ा उतना कभी नही बड़ा । पिछले 10 वर्षों में बच्चो को जितनी सुविधाएं दी गई उतनी कभी नही दी गई । लेकिन पिछले 10 वर्षों में जितनी सरकारी स्कूलों की हालात खराब हुए उतने कभी नही , क्यों ?
हर सुविधा मुफ्त में देने से बच्चे स्कूल में पढ़ने नही उस सुविधा का लाभ लेने आते हैं । भोजन करो और घर की और चलो , सायकल मिली और स्कूल बंद आदि।
बच्चों की उपस्थिति को अनिवार्य करना हैं तो सख्ती शिक्षक पर नही अभिभावकों पर करना होगी । शासकीय सुविधाओं ( गेँहू , चावल आदि ) का लाभ माह के अंत में स्कूल के प्रमाणीकरण पर ही दे , फिर देखे कैसे बच्चे स्कूल नही आते ?
सरकार के पास स्कूलों में शिक्षकों के आंकड़े तक नही हैं । कही 36 बच्चो पर 6 शिक्षक हैं तो कंही 200 बच्चो पर 4 शिक्षक काम कर रहे हैं और ऐसा वर्षो से चल रहा हैं क्यों ?
शिक्षकों को बच्चो के प्रवेश के आधार पर आर्थिक लाभ दिया जाये तो भी परिवर्तन सम्भव हैं । हमे हमारी पुरानी व्यवस्था ( A D I वाली ) और भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर आना होगा । पाश्चात्य नियमो का अनुसरण किया गया तो रोड़वेज की तरह शिक्षा विभाग भी बंद हो जायेगा।
सारे शिक्षक मक्कार नहीं हैं , कुछ शिक्षकों की वजह से सभी को नीचा देखना पड़ता हैं । मीडिया ने सिर्फ एक शिक्षक को पढ़ना नहीं आया कहकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। कई स्कूलों में विपरीत परिस्थितियों में शिक्षक अच्छा कार्य कर रहे हैं, उन्हें भी कभी फ्रंट पेज की न्यूज़ बनायें।
(सरकारी शिक्षक श्रीमती शकुंतला तोमरग्वालियर)
