कासिम खलील, बुलढाणा(महाराष्ट्र), NIT;
खेल तो हर कोई खेलता ही है किंतु खेल के क्षेत्र में किसी खिलाडी को उंचे स्थान तक पहुंचने के लिये बडे कठीन दौर से गुजरना पडता है, और इससे भी आगे परिवार की आर्थिक तंगी के बावजुद अपने बल पर उंचा मुकाम पाना निश्चित रुप से एक बडी उपलब्धी मानी जाएगी। कुछ ऐसा ही कारनामा मूल बुलढाणा जिले के ग्राम देवलघाट के दृष्टी बाधित युवक अनीस फखरुल्लाह बेग ने कर दिखाया है। अनीस ने अंध क्रिकेट विश्वकप में भाग लेकर पुरे बुलढाणा जिले का नाम रौशन किया है।
कल 12 फरवरी को बेंगलुरु में भारत-पाकिस्तान के बीच टी-20 क्रिकेट विश्वकप का फाइनल खेला गया। जिसमें भारत ने पाकिस्तान को हराते हुए यह खिताबी मुकाबला अपने नाम कर लिया। इस मैच में जो 11 खिलाडी भारत की ओर से मैदान में उतरे थे, उनमें से एक अनीस फखरुल्लाह बेग भी था। भारत के तीन खिलाडियों ने ही 198 रनों का लक्ष्य पुरा कर लिया था इसलिए अनीस को बैटिंग का मौका नही मिल पाया। अंध खिलाडियों के इस टी-20 क्रिकेट विश्वकप में भारत, पाकिस्तान, न्युजीलैंड, श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश, आॅस्ट्रेलिया, साऊथ अफ्रिका, वेस्टइंडीज एवं इंग्लैंड की यह 10 टीमें शामिल हुई थी। हर टीम ने 9 मुकाबले खेले। जिनमें से भारत ने 8 जीते थे। अपने स्वास्थ्य में बिगाड आने के बावजुद भी अनीस अपने प्रतिद्वंदी पाकिस्तान के खिलाफ मैदान में उतर गया था।अनीस के हौसले को सलाम।
अनीस की पैदाइश बुलढाणा जिले के देवलघाट में ही हुई। उसे दृष्टी दोष के कारण कम नजर आता था। इसके बावजुद बचपन से ही वह क्रिकेट का शौक रखता था। अनीस ने अपनी प्राथमिक शिक्षा नासिक में और हाईस्कूल व आईटीआय मुंबई में किया।उसने शिक्षा के साथ साथ क्रिकेट से नाता नहीं तोडा, हालांकि कई बार उसे कई संकटों का सामना भी करना पडा पर अनीस ने हार नहीं मानी और अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिये निरंतर प्रयासरत रहा।
28 वर्षीय अनीस बेग के पिता फखरुल्लाह बेग ट्रक ड्राइवर हैं और आर्थिक परेशानी के कारण वह देवलघाट को छोड़कर कुछ साल पहेले नासिक में बस गए थे।अनीस ने अपनी शिक्षा किसी तरह से पुरी तो की किंतु नौकरी नहीं मिल पाने के कारण वह मुंबई के उपनगर अंबरनाथ में रहेने लगा और लोकल ट्रेन में सामान बेचकर अपना उदरनिर्वाह करता रहा, इस के साथ ही वह क्रिकेट से जुडा रहा। आज भी अनीस को स्थाई नौकरी की तलाश है।
अनीस के अनुसार, दृष्टी बाधितों के क्रिकेट को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था। इसके बावजुद मैने हार नहीं मानी। आखिर मेरा खेल जब सामने आया तो मुझे मुंबई की के.बी.नामी संस्था ने क्रिकेट के लिये चुना और आज मैं भारतीय टीम में खेल रहा हुं जिस का मुझे गर्व है।
