संदीप शुक्ला, ब्यूरो चीफ, ग्वालियर (मप्र), NIT:

हिंदी और भारतीय संविधान के संबंधों पर प्रकाश डालते हुए गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS) के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने कहा कि भारत की भाषायी विविधता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक शक्ति है। हिंदी का विकास अन्य भारतीय भाषाओं के विरोध या वर्चस्व की भावना से नहीं, बल्कि उनके सम्मान, सह-अस्तित्व और पारस्परिक आदान-प्रदान के आधार पर होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान ने हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में संवैधानिक मान्यता दी है। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी है। वहीं संविधान के भाग XVII में भाषा संबंधी व्यापक प्रावधान किए गए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान में हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ नहीं कहा गया है, बल्कि उसे संघ की राजभाषा का दर्जा प्राप्त है।
श्री निमराजे ने बताया कि अनुच्छेद 345 राज्यों को अपनी राजभाषा अथवा राजभाषाओं के निर्धारण का अधिकार देता है, जिससे देश की संघीय और भाषायी विविधता का सम्मान सुनिश्चित होता है। वहीं अनुच्छेद 351 संघ को हिंदी के प्रसार और विकास का दायित्व सौंपता है तथा उसे भारत की सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने की दिशा देता है।
उन्होंने कहा कि हिंदी की शब्द-संपदा और विकास में संस्कृत के साथ-साथ अरबी, फारसी, अंग्रेजी तथा विभिन्न भारतीय भाषाओं का भी योगदान रहा है। इसलिए हिंदी का स्वभाव मूलतः समन्वयकारी और ग्रहणशील रहा है। तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, बंगाली, असमिया, गुजराती, पंजाबी, उर्दू, संस्कृत, मैथिली, मणिपुरी, बोडो और संथाली सहित देश की विभिन्न भाषाओं ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति को समृद्ध किया है।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शासन और नागरिकों के बीच प्रभावी संवाद के लिए सरल और जनसुलभ भाषा आवश्यक है। हिंदी के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय भाषाओं में सरकारी योजनाओं और नागरिक अधिकारों की जानकारी उपलब्ध कराना भी भाषायी लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
शिक्षा, न्याय और तकनीक में हिंदी के विस्तार की जरूरत पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा, विज्ञान, चिकित्सा, विधि, प्रबंधन और तकनीकी क्षेत्रों के लिए गुणवत्तापूर्ण मौलिक हिंदी सामग्री तैयार की जानी चाहिए। केवल अनुवादित सामग्री पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की जटिल अवधारणाओं को सरल, सटीक और वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करने वाली हिंदी विकसित करनी होगी।
डिजिटल युग को हिंदी के लिए बड़ी संभावना बताते हुए उन्होंने कहा कि इंटरनेट, सोशल मीडिया, डिजिटल पत्रकारिता, ऑनलाइन शिक्षा, पॉडकास्ट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने हिंदी के प्रयोग का दायरा व्यापक किया है। हालांकि गुणवत्तापूर्ण डिजिटल सामग्री, तकनीकी शब्दावली के मानकीकरण, मशीन अनुवाद, रोमन लिपि में हिंदी लेखन तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए पर्याप्त भाषायी डेटा जैसी चुनौतियां भी मौजूद हैं।
उन्होंने पूर्वोत्तर भारत का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां हिंदी को स्थानीय भाषाओं और संस्कृतियों के सम्मान के साथ संपर्क एवं संवाद की भाषा के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। हिंदी का प्रसार स्थानीय भाषाओं के विस्थापन का कारण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान का माध्यम बनना चाहिए।
श्री निमराजे ने हिंदी के विकास के लिए उच्च शिक्षा में गुणवत्तापूर्ण सामग्री, विज्ञान एवं तकनीक की मौलिक शब्दावली, भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद, संयुक्त भाषायी शोध, डिजिटल सामग्री और भाषा-तकनीक के लिए बड़े भाषायी कॉर्पस विकसित करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि भाषा का प्रश्न राजनीतिक विवाद के बजाय सांस्कृतिक, शैक्षिक और लोकतांत्रिक संवाद का विषय होना चाहिए।
उन्होंने निष्कर्ष में कहा कि हिंदी का भविष्य भारतीय भाषाओं के भविष्य से अलग नहीं है। हिंदी जितना अधिक भारतीय भाषाओं से संवाद करेगी, उतनी ही समृद्ध होगी। भारतीय संविधान की भावना भी भाषायी विविधता, सम्मान, समन्वय और सह-अस्तित्व को मजबूत करने में निहित है।

