संदीप शुक्ला, ब्यूरो चीफ, ग्वालियर (मप्र), NIT:

ग्वालियर अंचल की पहचान केवल किलों, महलों और राजवंशों की ऐतिहासिक विरासत तक सीमित नहीं है। यहां की धरती में भूवैज्ञानिक, जल-सांस्कृतिक, पुरातात्विक और धार्मिक विरासत की कई परतें मौजूद हैं। भदावना जलप्रपात एवं मंदिर क्षेत्र इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। वर्षा ऋतु में चट्टानों के बीच बहती जलधारा, प्राकृतिक भू-आकृतियां, शिव मंदिर और स्थानीय धार्मिक परंपराएं भदावना को प्रकृति और आस्था के अनूठे संगम के रूप में पहचान देती हैं।
गोपाल किरन समाजसेवी संस्था के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे के अनुसार, भदावना को केवल मौसमी पिकनिक स्थल या धार्मिक स्थान के रूप में देखने के बजाय इसे भू-विरासत, जल-विरासत, धार्मिक पर्यटन और इको-टूरिज्म के संयुक्त केंद्र के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है। इसके लिए वैज्ञानिक अध्ययन, पुरातात्विक सर्वेक्षण, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदाय की भागीदारी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
उन्होंने बताया कि ग्वालियर के भूवैज्ञानिक स्वरूप को सीधे अरावली पर्वतमाला का हिस्सा कहना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है। ग्वालियर क्षेत्र का व्यापक भूवैज्ञानिक परिवेश बुंदेलखंड क्रेटॉन और ग्वालियर समूह की प्राचीन चट्टानी संरचनाओं से जुड़ा है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार ग्वालियर समूह की चट्टानों का भूवैज्ञानिक इतिहास लगभग 1.9 अरब वर्ष पुराना माना जाता है। वहीं ग्वालियर क्षेत्र की कुछ मैग्मेटिक संरचनाओं, जिन्हें ‘ग्वालियर सिल्स’ कहा जाता है, की आयु लगभग 1.72 अरब वर्ष बताई गई है।
भदावना की चट्टानें अपने आप में अध्ययन का विषय हैं। जल के लगातार प्रवाह और प्राकृतिक अपक्षय ने इन चट्टानों की आकृतियों को प्रभावित किया है। ऐसे में यहां एक व्यवस्थित ‘भदावना भू-विज्ञान पथ’ विकसित किया जा सकता है, जहां विद्यार्थियों और पर्यटकों को चट्टानों की संरचना, जल अपरदन, भूगर्भीय समय-रेखा और ग्वालियर क्षेत्र के भूवैज्ञानिक इतिहास की जानकारी दी जाए।
भदावना का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष मुरार नदी से उसका संबंध है। मध्य प्रदेश विधानसभा के आधिकारिक अभिलेख में मुरार नदी के भदावना झरने से शुरू होकर ग्वालियर और गोहद होते हुए भिंड जिले के भारौली गांव में सिंध नदी में मिलने का उल्लेख मिलता है। इस दृष्टि से भदावना को जल संरक्षण और नदी पुनर्जीवन से जोड़कर विकसित किया जा सकता है। यहां ‘जल-विरासत केंद्र’ बनाकर वर्षाजल, भूजल, नदी प्रणाली, जल संरक्षण और मुरार नदी के पुनर्जीवन से संबंधित जानकारी लोगों तक पहुंचाई जा सकती है।
भदावना की धार्मिक पहचान भी महत्वपूर्ण है। स्थानीय समाज में शिव मंदिर, साधना और जलधारा से जुड़ी अनेक मान्यताएं प्रचलित हैं। हालांकि इन लोककथाओं को ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उन्हें स्थानीय लोकमान्यता के रूप में दर्ज किया जाना अधिक उचित होगा। वहीं ग्वालियर-पवाया क्षेत्र से प्रथम शताब्दी ईस्वी के महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं। पवाया से प्राप्त यक्ष मणिभद्र की प्रतिमा और ब्राह्मी अभिलेख क्षेत्र की प्राचीन सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को प्रमाणित करते हैं। हालांकि भदावना स्थल पर प्रथम शताब्दी का मंदिर या अभिलेख होने का प्रत्यक्ष प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं है। इसलिए भदावना के आसपास व्यवस्थित पुरातात्विक सर्वेक्षण की आवश्यकता है।
श्री निमराजे के अनुसार, भदावना का विकास करते समय ‘कम निर्माण, अधिक संरक्षण’ का सिद्धांत अपनाया जाना चाहिए। जलप्रपात क्षेत्र में सुरक्षित व्यूइंग प्लेटफॉर्म, रेलिंग, चेतावनी संकेत, प्राथमिक उपचार केंद्र, सीसीटीवी और प्रशिक्षित सुरक्षा दल जैसी सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं। मानसून के दौरान पर्यटकों की संख्या नियंत्रित करने के लिए क्षेत्र की ‘कैरिंग कैपेसिटी’ निर्धारित करना भी जरूरी होगा।
उन्होंने सुझाव दिया कि भदावना में पार्किंग, स्वच्छ पेयजल, शौचालय, कचरा प्रबंधन और सूचना केंद्र जैसी मूलभूत सुविधाओं के साथ स्थानीय उत्पादों के लिए बाजार विकसित किया जाए। स्थानीय युवाओं को नेचर गाइड, हेरिटेज गाइड, फर्स्ट-एड वालंटियर और इको-गार्ड के रूप में प्रशिक्षित किया जा सकता है। महिला स्वयं सहायता समूहों को स्थानीय खाद्य पदार्थ, हस्तशिल्प, पौधशाला और अन्य उत्पादों के माध्यम से पर्यटन अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा सकता है।
भदावना को विश्वविद्यालयों के लिए फील्ड स्टडी सेंटर के रूप में भी विकसित किया जा सकता है। भूविज्ञान, भूगोल, पुरातत्व, इतिहास, पर्यावरण विज्ञान, समाजशास्त्र, पर्यटन प्रबंधन और जल संसाधन प्रबंधन के विद्यार्थी यहां नियमित अध्ययन यात्राएं कर सकते हैं। इससे भदावना पर्यटन के साथ-साथ शोध और शिक्षा का केंद्र भी बन सकेगा।
भदावना को ग्वालियर के व्यापक पर्यटन सर्किट से जोड़ने की भी संभावना है। ग्वालियर किला, गुजरी महल, पवाया, भदावना, मुरार नदी और तिघरा क्षेत्र को जोड़कर प्राकृतिक एवं विरासत पर्यटन सर्किट विकसित किया जा सकता है। इससे स्थानीय पर्यटन गतिविधियों के विस्तार के साथ रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
भदावना के विकास को लेकर पूर्व में भी सरकारी स्तर पर योजनाएं सामने आती रही हैं। वर्ष 2023 में इसके सौंदर्यीकरण एवं विकास से संबंधित 144 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजना के भूमिपूजन की रिपोर्ट सामने आई थी। ऐसे में नई योजना बनाने से पहले पूर्व स्वीकृत परियोजनाओं की वर्तमान स्थिति, पूर्ण हुए कार्य, लंबित कार्य और उनकी उपयोगिता का स्वतंत्र तकनीकी एवं सामाजिक आकलन किया जाना आवश्यक है।
श्री निमराजे का प्रस्ताव है कि भदावना के लिए ‘भदावना 2030’ जैसी दीर्घकालीन योजना तैयार की जाए। इसके पहले चरण में भूवैज्ञानिक मैपिंग, पुरातात्विक सर्वेक्षण, जैव-विविधता अध्ययन, जल-प्रवाह अध्ययन, सुरक्षा ऑडिट और कैरिंग कैपेसिटी का आकलन किया जाए। इसके बाद आधारभूत सुविधाओं का विकास, भू-विरासत पथ, जल-विरासत केंद्र, स्थानीय गाइड प्रशिक्षण और शैक्षणिक कार्यक्रम शुरू किए जाएं। दीर्घकाल में इसे ग्वालियर के पर्यटन सर्किट और विश्वविद्यालयों के साथ जोड़ा जा सकता है।
उन्होंने कहा कि भदावना पर ‘Geological, Archaeological, Hydrological and Cultural Heritage of Gwalior Region’ विषय पर बहुविषयक शोध परियोजना शुरू की जानी चाहिए, जिसमें भूविज्ञान, पुरातत्व, इतिहास और पर्यावरण विज्ञान के विशेषज्ञों के साथ स्थानीय समुदाय की जानकारी को भी शामिल किया जाए।
भदावना को केवल बारिश में बहने वाला झरना मानना उसके महत्व को सीमित करना होगा। यहां अरबों वर्ष पुरानी चट्टानों का भूवैज्ञानिक इतिहास, ग्वालियर क्षेत्र की प्राचीन मानव सभ्यता की पृष्ठभूमि, धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराएं और आधुनिक पर्यटन की संभावनाएं एक साथ दिखाई देती हैं। हालांकि भदावना की प्रत्यक्ष पुरातात्विक प्राचीनता स्थापित करने के लिए अभी वैज्ञानिक सर्वेक्षण आवश्यक है।
श्रीप्रकाश सिंह निमराजे के अनुसार, भदावना को ऐसा विरासत केंद्र बनाया जाना चाहिए जहां पर्यटक प्रकृति को समझें, विद्यार्थी भूविज्ञान सीखें, शोधकर्ता इतिहास की नई कड़ियां तलाशें, श्रद्धालु आस्था से जुड़ें और स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर मिलें। इसके विकास का मूल मंत्र “विरासत का संरक्षण, प्रकृति का सम्मान और स्थानीय समुदाय का विकास” होना चाहिए।
