मेघालय की लोकपरंपराओं, बौद्ध सांस्कृतिक उपस्थिति और हिंदी की भूमिका पर शोधपरक अध्ययन प्रस्तुत | New India Times

संदीप शुक्ला, ब्यूरो चीफ, ग्वालियर (मप्र), NIT:

मेघालय की लोकपरंपराओं, बौद्ध सांस्कृतिक उपस्थिति और हिंदी की भूमिका पर शोधपरक अध्ययन प्रस्तुत | New India Times

मेघालय की समृद्ध लोकपरंपराओं, जनजातीय संस्कृति, बौद्ध सांस्कृतिक उपस्थिति तथा 21वीं सदी में हिंदी की बदलती भूमिका को लेकर शोधपत्र “मेघालय की लोकपरंपराएं, बौद्ध सांस्कृतिक उपस्थिति और 21वीं सदी में हिंदी : चुनौतियां, संभावनाएं एवं सामाजिक-सांस्कृतिक संवाद” प्रस्तुत किया गया है। यह शोध गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे द्वारा तैयार किया गया है।
शोध में मेघालय को पूर्वोत्तर भारत की बहुलतापूर्ण सांस्कृतिक संरचना का महत्वपूर्ण क्षेत्र बताते हुए खासी, प्नार/जयंतिया और गारो समुदायों की लोकपरंपराओं, भाषाओं, कृषि आधारित उत्सवों, लोकगीतों, लोकनृत्यों, मौखिक परंपराओं, मातृवंशीय सामाजिक व्यवस्था तथा प्रकृति-केंद्रित जीवनदृष्टि का अध्ययन किया गया है। इसमें Mawphlang Sacred Forest की परंपरा को प्रकृति संरक्षण और पारंपरिक सामुदायिक ज्ञान का उल्लेखनीय उदाहरण बताया गया है। वहीं गारो समुदाय के Wangala कृषि पर्व को कृषि, प्रकृति, सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक स्मृति का महत्वपूर्ण प्रतीक माना गया है।

बौद्ध धर्म के इतिहास पर प्रमाण आधारित दृष्टिकोण
शोध में मेघालय में भगवान बुद्ध के आगमन से जुड़े ऐतिहासिक दावों की भी समीक्षा की गई है। अध्ययन के अनुसार, मेघालय में भगवान बुद्ध के प्रत्यक्ष आगमन का प्रमाणित ऐतिहासिक या पुरातात्त्विक साक्ष्य वर्तमान में उपलब्ध नहीं है। इसलिए लोकश्रुति और प्रमाणित इतिहास के बीच अंतर बनाए रखने पर जोर दिया गया है।
पूर्वोत्तर भारत के व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में प्राचीन कामरूप, वर्तमान असम क्षेत्र में बौद्ध धर्म की उपस्थिति से जुड़े साहित्यिक एवं पुरातात्त्विक संकेतों तथा सातवीं शताब्दी में चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनसांग की कामरूप यात्रा को महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संपर्क के रूप में रेखांकित किया गया है।  आधुनिक मेघालय में शिलांग का बुद्ध मंदिर बौद्ध धार्मिक-सांस्कृतिक उपस्थिति का उदाहरण बताया गया है।

स्थानीय भाषाओं के साथ हिंदी को सेतु भाषा बनाने पर जोर
शोध में कहा गया है कि 21वीं सदी में हिंदी की भूमिका साहित्य और पारंपरिक शिक्षा तक सीमित नहीं है। डिजिटल मीडिया, पत्रकारिता, पर्यटन, शिक्षा, सोशल मीडिया, अनुवाद, शोध और अंतरराज्यीय संवाद में हिंदी के नए अवसर विकसित हुए हैं।
बहुभाषिक पूर्वोत्तर में हिंदी को स्थानीय भाषाओं के विकल्प या प्रतिस्थापन के रूप में नहीं, बल्कि संवाद और संपर्क की सेतु भाषा के रूप में विकसित करने की आवश्यकता बताई गई है। शोध के अनुसार स्थानीय भाषाएं सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय ज्ञान की वाहक हैं, हिंदी व्यापक भारतीय संवाद का माध्यम बन सकती है, जबकि अंग्रेजी वैश्विक ज्ञान, विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय संपर्क की महत्वपूर्ण भाषा है।

लोकसंस्कृति के डिजिटल संरक्षण का सुझाव
शोध में मेघालय की लोककथाओं, लोकगीतों, लोकनृत्यों, पारंपरिक भोजन, कृषि ज्ञान, लोकपर्व और पर्यावरणीय ज्ञान के संरक्षण के लिए ‘मेघालय लोकसंस्कृति डिजिटल अभिलेख’ जैसी पहल शुरू करने का सुझाव दिया गया है। इसमें स्थानीय भाषाओं में मूल सामग्री के साथ हिंदी अनुवाद, ऑडियो, वीडियो और डिजिटल दस्तावेज उपलब्ध कराने की परिकल्पना की गई है।
शोध में पूर्वोत्तर में हिंदी के विकास के लिए बहुभाषिक शिक्षा को बढ़ावा देने, स्थानीय लोकसाहित्य के हिंदी अनुवाद, द्विभाषी एवं त्रिभाषी शब्दकोश तैयार करने, डिजिटल सामग्री विकसित करने, विश्वविद्यालयों के संयुक्त शोध प्रकल्प शुरू करने तथा युवाओं के लिए व्यावहारिक हिंदी प्रशिक्षण विकसित करने जैसे सुझाव भी दिए गए हैं।

सेमिनार के माध्यम से संवाद की पहल
GKSSS द्वारा प्रस्तावित सेमिनार को शोध, सामाजिक अनुभव, भाषा और सांस्कृतिक संवाद को साझा मंच पर लाने की पहल बताया गया है। सेमिनार में पूर्वोत्तर की भाषायी विविधता, हिंदी का विकास, स्थानीय भाषाओं का संरक्षण, जनजातीय संस्कृति, लोकपरंपराओं का दस्तावेजीकरण, बौद्ध सांस्कृतिक विरासत, अनुवाद, डिजिटल माध्यम, बहुभाषिक शिक्षा तथा सामाजिक संस्थाओं और विश्वविद्यालयों की भूमिका पर चर्चा प्रस्तावित है।
शोधकर्ता श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने कहा कि पूर्वोत्तर भारत हिंदी के विस्तार का मात्र क्षेत्र नहीं, बल्कि भारत की बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक आत्मा को समझने का महत्वपूर्ण द्वार है। हिंदी की वास्तविक शक्ति स्थानीय भाषाओं को पीछे करने में नहीं, बल्कि उनके साथ संवाद स्थापित कर विविध आवाजों को व्यापक मंच देने में है।
शोध के निष्कर्ष में कहा गया है कि मेघालय की लोकपरंपराएं, प्रकृति-केंद्रित जीवनदृष्टि, जनजातीय सामाजिक संस्थाएं और बौद्ध सांस्कृतिक संपर्क भारतीय सांस्कृतिक बहुलता को समझने के महत्वपूर्ण आधार हैं। 21वीं सदी में हिंदी की सार्थक भूमिका तभी मजबूत होगी, जब वह समावेशी, बहुभाषिक, संवादात्मक, अनुवाद-केंद्रित और तकनीक-सक्षम भाषा के रूप में स्थानीय भाषाओं और संस्कृतियों के साथ आगे बढ़े।

By nit

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.