अबरार अहमद खान/मुकीज़ खान, भोपाल (मप्र), NIT:
जमीअत उलमा मध्य प्रदेश के अध्यक्ष हाजी मोहम्मद हारून ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा कि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का मसौदा विधान सभा में प्रस्तुत किया जा चुका है और संख्या बल के आधार पर इसे पारित भी कराया जा सकता है। उनका कहना है कि इस प्रकार का कदम सरकार के मनमाने रवैये को दर्शाता है एवं यह अल्पसंख्यकों पर संख्या के आधार पर बहुसंख्यकों का जुल्म और ज्यादती भरा क़दम होगा तथा अल्पसंख्यकों की धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान की उपेक्षा करता है। उनके अनुसार, इस प्रकार की प्रक्रिया से अल्पसंख्यक समाज में अविश्वास और असुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है।
उन्होंने कहा कि तलाक, विवाह और विरासत जैसे विषय मूलतः दीवानी (सिविल) प्रकृति के होते हैं, किंतु सरकार इन विषयों का स्वरूप बदलकर उन्हें आपराधिक दायरे में लाने का प्रयास कर रही है। इससे इन मामलों की मूल प्रकृति प्रभावित होगी। उनका कहना था कि यदि किसी कारणवश कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को तलाक देता है, तो उसे एक सामान्य दीवानी विवाद के पक्षकार के बजाय एक अपराधी के रूप में देखा जाएगा, जो न्याय और विधि के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
उन्होंने आगे कहा कि मध्य प्रदेश में प्रस्तावित समान नागरिक संहिता के दायरे से प्रदेश के करोड़ों आदिवासी नागरिकों को अलग रखा जा रहा है। इसके अतिरिक्त जब यह कानून केवल एक राज्य तक सीमित रहेगा और पूरे देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू नहीं होगा, तो यह “एक देश, एक कानून” की अवधारणा को किस प्रकार साकार करेगा, यह एक गंभीर प्रश्न है।
उन्होंने कहा कि विधान सभा में समय-समय पर अनेक विधेयक और कानून प्रस्तुत एवं पारित होते रहते हैं, जिनका अल्पसंख्यक समाज कभी विरोध नहीं करता। किंतु समान नागरिक संहिता का विषय सीधे तौर पर नागरिकों के व्यक्तिगत एवं धार्मिक कानूनों से जुड़ा हुआ है। इसलिए बिना व्यापक संवाद और सहमति के इस प्रकार का कानून लागू करना उचित नहीं माना जा सकता।
हाजी मोहम्मद हारून ने कहा कि कुछ समय पूर्व राज्य सरकार ने आम नागरिकों एवं विभिन्न धार्मिक समुदायों से सुझाव अवश्य आमंत्रित किए थे, किंतु उस समय समान नागरिक संहिता का कोई मसौदा सार्वजनिक नहीं किया गया था। परिणामस्वरूप लोगों को यह जानकारी ही नहीं थी कि सरकार किस प्रकार का कानून लाने जा रही है। ऐसे में सुझाव मांगने की प्रक्रिया भी प्रभावी और सार्थक नहीं कही जा सकती।
उन्होंने आगे कहा कि इतिहास में अंग्रेजी शासन की कठोर नीतियों की आलोचना होती रही है, लेकिन अंग्रेजी शासन भी अनेक अवसरों संबंधित विषयों पर प्रभावित वर्गों से राय-मशविरा करता था। आज एक लोकतांत्रिक देश में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार यदि नागरिकों, विशेषकर अल्पसंख्यकों एवं संबंधित धार्मिक समुदायों से पर्याप्त परामर्श किए बिना इतना महत्वपूर्ण कानून लागू करना चाहती है, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों और सहभागिता की भावना के अनुरूप नहीं कहा जा सकता।
उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार से आग्रह किया कि समान नागरिक संहिता को वर्तमान स्वरूप में लागू न किया जाए। पहले इसका पूरा मसौदा जनता के सामने रखा जाए और सभी धार्मिक समुदायों, विधि विशेषज्ञों तथा सामाजिक संगठनों से पुनः व्यापक सुझाव प्राप्त किए जाएँ। उनका कहना था कि धार्मिक मामलों से संबंधित किसी भी कानून का निर्माण सभी पक्षों से विचार-विमर्श और संवाद के आधार पर होना चाहिए।
हाजी मोहम्मद हारून ने कहा कि मुसलमान अपने धार्मिक मामलों में किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेंगे। इसलिए सरकार को हठधर्मिता का रवैया छोड़कर सभी समुदायों के साथ संवाद स्थापित करना चाहिए और उनके सुझावों के आधार पर आगे की प्रक्रिया अपनानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि प्रदेश में बिना व्यापक सहमति और संवाद के समान नागरिक संहिता लागू की जाती है, तो जमीअत उलमा इस विषय को राष्ट्रीय स्तर पर उठाएगी। साथ ही भारत के प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की जाएगी तथा उपलब्ध कानूनी विकल्पों पर भी विचार-विमर्श किया जाएगा।

