अबरार अहमद खान/मुकीज़ खान, भोपाल (मप्र), NIT:
राजधानी भोपाल में ईद उल फितर का त्योहार बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। सुबह से ही बच्चे, बुजुर्ग, जवान और महिलाओं में ईद की नमाज अदा करने का उत्साह देखा गया।

सुबह 07 बजे न्यू कबाड़ खाना स्थित जामा मस्जिद अहले हदीस में मौलाना मोहम्मद मुदस्सिर सल्फ़ी ने नमाज़ अदा कराई। उसके बाद उन्होंने अपने भाषण में सब से पहले अल्लाह की प्रशंसा की फिर नबी करीम सलल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दरूद भेजा।मौलाना मोहम्मद मुदस्सिर सल्फी ने लोगों से ख़िताब करते हुये कहा कि अल्हम्दुलिल्लाह आज हम सब उस रब्बुल आलमीन का शुक्र अदा करते हैं जिसने हमें रमज़ान मुबारक की बरकतों से मालामाल किया। हमें रोज़ा, नमाज़ और दीगर इबादत की तौफ़ीक अता फरमाई, और आज हम सब को ईद की खुशियों में एक साथ जमा होने का मौक़ा दिया।मौलाना मोहम्मद मुदस्सिर सल्फी ने लोगों से ख़िताब करते हुये कहा कि
ऐ अज़ीज़ भाइयों और बहनों रमज़ान हमसे रुख़्सत हो चुका है लेकिन उसका पैग़ाम हमारे साथ ज़िंदा रहना चाहिए।
आज मैं आप सब के सामने तीन अहम पैग़ाम पेश करना चाहता हूँ।

पहला पैग़ाम — क़ुरआन के ताल्लुक़ से:
मौलाना ने अपने संबोधन में कहा कि क़ुरआन मजीद सिर्फ पढ़ने की किताब नहीं है, बल्कि यह समझने और अमल करने की किताब है। अगर हम क़ुरआन को समझ कर पढ़ेंगे, उसकी तालीमात पर अमल करेंगे, तो अल्लाह तआला हमें इज़्ज़त और सरबलंदी अता फरमाएगा।लेकिन अगर हमने क़ुरआन को छोड़ दिया, उसे समझना बंद कर दिया, तो याद रखिए ज़िल्लत और पस्ती हमारा मुक़द्दर बन जाएगी।
क़ुरआन किताब-ए-हिदायत है, किताब-ए-अक़ीदा है, और मुकम्मल निज़ाम-ए-ज़िंदगी है। यह हमारी कामयाबी और नाकामी का फ़ैसला करने वाला आसमानी क़ानून है।
ऐ लोगो सिर्फ सुबह-शाम क़ुरआन पढ़ लेना काफ़ी नहीं, बल्कि उसे समझना और अपनी ज़िंदगी में लागू करना भी उतना ही ज़रूरी है।

दूसरा पैग़ाम — मुल्क के हालात के तनाज़ुर में:
आज का दौर हमें यह सिखा रहा है कि अगर क़ौमें अपने रास्ते से भटक जाएँ, नाफ़रमानी को अपना लें, तो अल्लाह उन पर ज़ालिम हुक्मरानों को मुसल्लत कर देता है।
इसलिए हमें अपने हालात से सबक़ लेना होगा।
आज हमें जोश से ज़्यादा होश की ज़रूरत है, जज़्बात से ज़्यादा हिकमत और संजीदगी की ज़रूरत है। इंतिक़ाम नहीं, बल्कि सब्र, दरगुज़र और बेहतर अख़लाक़ की ज़रूरत है।
अगर इस मुल्क में सर उठाकर जीना है, तो क़ानून को जानना होगा, क़ानून को पढ़ना होगा। अपने हक़ूक़ की हिफ़ाज़त के लिए क़ानून की समझ बेहद ज़रूरी है।
अपने बच्चों को दीन के साथ साथ दुनिया की भी तालीम दो । उन्हें अच्छा मुसलमान बनाने के साथ-साथ डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, जज और अफ़सर भी बनाओ।
याद रखो अगर तालीम को नज़रअंदाज़ करोगे, तो इज़्ज़त से जीना मुश्किल हो जाएगा।

तीसरा पैग़ाम — ख़वातीन के नाम:
ऐ मोहतरम माँओं और बहनों! क़ौमों के उरूज और ज़वाल में आपका किरदार बुनियादी होता है।
अगर आप दीनदार होंगी, मुत्तक़ी होंगी, तो घर सँवरेगा, ख़ानदान सँवरेगा, और पूरी क़ौम सँवर जाएगी।
लेकिन अगर महिलाएं बिगड़ जाएँ, तो यह सिर्फ उनका बिगाड़ नहीं होता, बल्कि पूरे मुआशरे और पूरी क़ौम का बिगाड़ बन जाता है।इसलिए अपने किरदार को मज़बूत बनाइए, हया, दीनदारी और अख़लाक़ को अपनाइए।
अंत में मौलाना ने सब मुसलमानों के लिए दुआ करते हुए कहा कि अल्लाह पूरी दुनिया के मुसलमानों को सलामत रख, मुसलमानों पर हो रहे जुल्म को खतम कर दे,हमारी इबादतों को क़ुबूल फरमा, जो बीमार हैं उन्हें ठीक कर दे। हमें क़ुरआन से जोड़ दे, हमारे मुल्क में अम्न व सलामती अता फरमाए, और हमें सही रास्ते पर चलने की तौफ़ीक दे।नमाज़ के बाद सब मुसलमानों ने एक दूसरे को ईद की मुबारकबादी पेश की।

