ताहिर मिर्ज़ा, ब्यूरो चीफ, यवतमाल (महाराष्ट्र), NIT:
महाराष्ट्र के जालना ज़िले की अंबड़ तहसील अंतर्गत रवना पराडा गांव में स्थित हाफ़िज़ सैयद अलाउद्दीन ज़िया चिश्ती रहमतुल्ला अलैह की दरगाह रूहानी फ़ैज़ का बड़ा मरकज़ मानी जाती है। इस दरगाह पर हर धर्म और समुदाय के लोग अपनी मन्नतों और मुरादों को लेकर पहुंचते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बाबा के दरबार से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता। दरगाह से जुड़े अनेक करिश्मों की चर्चा दूर-दूर तक है। मान्यता है कि जिन दंपत्तियों को संतान नहीं होती, उन्हें बाबा की नज़र-ए-करम से औलाद नसीब होती है। वहीं संकट की घड़ी में यहां आने वाले लोग राहत और सुकून पाकर लौटते हैं।
इतिहास के अनुसार, लगभग 647 वर्ष पूर्व हाफ़िज़ अलाउद्दीन ज़िया चिश्ती रह. औरंगाबाद ज़िले के खुल्दाबाद से इस गांव में आए थे। वे इस्लाम धर्म के प्रचार के साथ-साथ अमन और शांति का संदेश लेकर यहां पहुंचे और यहीं स्थायी रूप से बस गए।
जिस स्थान पर दरगाह स्थित है, उसके समीप एक नदी बहती है। बरसात के मौसम में नदी का जलस्तर बढ़ जाने पर दरगाह का परिसर मजार तक पानी से घिर जाता है। इसके बावजूद मजार के पास स्थित चिराग़ का लगातार जलते रहना लोगों की आस्था के अनुसार बाबा का करिश्मा माना जाता है।
हाफ़िज़ सैयद अलाउद्दीन ज़िया चिश्ती रह. का सालाना संदल (उर्स) हर वर्ष दिसंबर और जनवरी माह के बीच मनाया जाता है। इस मौके पर हजारों की संख्या में बाबा के मुरीद और श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं के साथ दरगाह पर हाज़िरी लगाते हैं।
