रहीम शेरानी हिन्दुस्तानी, ब्यूरो चीफ, झाबुआ (मप्र), NIT:

पोषध अर्थात वह साधना जिससे आत्मगुणों का पोषण होता है। पोषध दो प्रकार के होते हैं — प्रतिपूर्ण पोषध और डेढ़ पोषध। प्रतिपूर्ण पोषध आठ प्रहर का होता है, जबकि डेढ़ पोषध पाँच प्रकार का होता है। एक माह में कुल छह पोषध होते हैं।
पोषध के दौरान जीव सांसारिक कार्यों से निवृत्त होकर आत्मचिंतन में लीन होता है। जब कोई श्रावक चारों आहार, अब्रह्म, सभी प्रकार की साज-सज्जा और समस्त सावध्य योग का त्याग करता है, तब उसका पोषध प्रतिपूर्ण पोषध कहलाता है।
आचार्य प्रवर उमेशमुनि जी कहा करते थे कि “अष्टप्रहरी पोषध चौविहार ही होता है।” इन्हीं वचनों के संदर्भ में रुनवाल बाजार स्थित महावीर भवन पर चल रहे संयम उपवन वर्षावास में आयोजित धर्मसभा के दौरान पूज्या महासती प्रज्ञा जी म.सा. ने अपने प्रवचन में कहा —
“जो जीव रात्रि के अंतिम प्रहर में धर्म-जागरण करता है, उसके सुख, सौभाग्य और गुणों में वृद्धि होती है।”
उन्होंने आगे बताया कि श्रवण भगवान महावीर स्वामी के शासनकाल में 1400 साधु और 3600 साध्वियाँ थीं। जिनेश्वर भगवान के शासन में अनेक भव्य जीव साधना में रत रहते हैं, परंतु कई साधक आत्मसाधना की बजाय शरीर की शुद्धि में ही उलझे रहते हैं। जब जीव आत्मा की चिंता करता है, तब वह उभयकाल प्रतिक्रमण कर अपने पापों की आलोचना करता है।
धर्मसभा में साध्वी सौम्यप्रभा जी ने कहा —
“कुसंग और सत्संग जीवन में परिवर्तन के मुख्य कारण हैं। कुसंग को अपनाने वाला व्यक्ति पतन की ओर जाता है — उसका प्रारंभ भी दुखद होता है और अंत भी। जबकि सत्संग से जीवन में सद्गुण और सकारात्मकता आती है। सत्संग अपनाने से जीवन केसर की तरह सुगंधित हो जाता है और व्यक्ति को जीवन जीने की कला प्राप्त होती है।” चातुर्मास के अंतिम चरण में चांदनी कटारिया ने छह उपवासों का प्रत्याख्यान ग्रहण किया, जबकि कविता धम्माणी ने तेला तप किया।
धर्मसभा में एकासन, बियासन, उपवास, आयंबिल और निवी तप के प्रत्याख्यान भी हुए। पाठशाला संचालिका मंडल सदस्य प्रिया कटकानी ने बताया कि इस वर्ष चातुर्मास के प्रारंभ में दो माह तक अणु संस्कार शाला के बच्चों के लिए धर्म आराधना नियमावली बनाई गई थी। बच्चों ने नियमानुसार उत्कृष्ट धर्म-आराधना की, जिसके फलस्वरूप सभी 54 बच्चों को प्रवचन के पश्चात प्रभावना में अणु मुद्रा वितरित की गई।
श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रीसंघ के अध्यक्ष प्रदीप रुनवाल ने बताया कि चातुर्मास का प्रारंभ पेषठिया छंद के जाप से हुआ था। अब चातुर्मास के केवल तीन दिन शेष हैं, और इसका समापन भी त्रिदिवसीय पेषठिया छंद जाप से किया जाएगा।

