जमशेद आलम, ब्यूरो चीफ, भोपाल (मप्र), NIT:
सुप्रीम कोर्ट ने सम हिंदूस्थानी यूनिवर्सिटी (SHUATS) के कुलपति डॉ. राजेंद्र बिहारी लाल और अन्य याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला देते हुए उत्तर प्रदेश धर्म स्वतंत्रता (अवैध रूपांतरण निषेध) अधिनियम, 2021 के तहत दर्ज पाँच FIR रद्द कर दीं। अदालत ने माना कि इन मामलों में धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का दुरुपयोग हुआ है।
🔹 पृष्ठभूमि:
फतेहपुर ज़िले में कथित “सामूहिक धर्मांतरण” के आरोपों पर ये एफआईआर दर्ज की गई थीं, जिनमें 14 अप्रैल 2022 की एक प्रार्थना सभा को “रूपांतरण कार्यक्रम” बताकर कई लोगों पर मुकदमे दर्ज हुए थे। कुल छह एफआईआर थीं — जिनमें से पाँच को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया और एक (एफआईआर 538/2023) में आंशिक राहत दी।
🔹 अदालत की प्रमुख टिप्पणियाँ:
एफआईआर 224/2022: शिकायतकर्ता पात्र नहीं था (ग़ैर-पीड़ित), साक्ष्य अविश्वसनीय पाए गए।
एफआईआर 47/2023: एक साल से ज़्यादा देरी और विरोधाभासों के कारण रद्द।
एफआईआर 54/2023, 55/2023, 60/2023: एक ही घटना पर कई एफआईआर दर्ज थीं — टी.टी. एंटनी बनाम केरल राज्य (2001) के सिद्धांत के अनुसार अस्वीकार्य।
एफआईआर 538/2023: धर्मांतरण संबंधी धाराएँ रद्द, IPC की धाराओं पर अलग सुनवाई होगी।
🔹 संवैधानिक दृष्टिकोण:
अनुच्छेद 21: व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा का संरक्षण।
अनुच्छेद 25: धर्म का पालन, प्रचार और परिवर्तन करने की स्वतंत्रता, बशर्ते वह स्वैच्छिक हो।
अदालत ने कहा — “आपराधिक कानून निर्दोषों को परेशान करने का औज़ार नहीं बन सकता।”
🔹 अंतिम आदेश:
पाँचों एफआईआर (224/2022, 47/2023, 54/2023, 55/2023, 60/2023) रद्द।
एफआईआर 538/2023 में यूपी अधिनियम का भाग रद्द, IPC धाराएँ बनी रहेंगी।
सभी याचिकाएँ स्वीकार, कोई लागत नहीं लगाई गई।
📌 यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता दोनों की रक्षा करते हुए धर्मांतरण कानून के दुरुपयोग पर महत्वपूर्ण नज़ीर स्थापित करता है।

