अशफाक कायमखानी, ब्यूरो चीफ, जयपुर (राजस्थान), NIT:

पिछले दो लोकसभा चुनावों में प्रदेश की सभी पच्चीस सीटों पर भाजपा का कब्जा रहने के बावजूद आज इण्डिया गठबंधन ने ग्यारह सीटों पर कब्जा करके भाजपा के दबदबे को कमज़ोर करके आगामी दिनों में सियासत के समीकरण बदलने के संकेत दिये हैं।
प्रदेश व केन्द्र सरकार में मंत्री रहे राजस्थान कांग्रेस के सीनियर नेता शीशराम ओला के पूत्र विजेंदर ओला झूंझुनू से व भाजपा के दिग्गज नेता रहे रामसिंह कस्वा के पूत्र राहुल कस्वां के पाला बदलकर कांग्रेस से चुनाव चूरु से जीता है। विजेंद्र ओला स्वयं चार दफा के विधायक व राज्य में मंत्री रह चुके हैं। बाडमेर से चुनाव जीते उम्मेदा राम रालोपा से पाला बदलकर कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़कर जीते है। नागौर से दूसरी दफा सांसद बने हनुमान बेनीवाल 2019 में एनडीए के घटक के तौर पर अब इण्डिया के घटक के तौर पर चुनाव जीते है। दोनों दफा मिर्धा परिवार की ज्योति मिर्धा को चुनाव हराया है।
बांसवाड़ा से बाप के राजकुमार रोत पहली दफा सांसद बने हैं। उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा के उम्मीदवार बने महेन्द्र जीत मालवीय को हराया है। राजकुमार रोता की भारतीय आदिवासी पार्टी ने बागीदौरा विधानसभा का उप चुनाव भी जीता है। 1989 में माकपा के नीसान पर बीकानेर लोकसभा से कामरेड श्योपत सिंह पहले सांसद चुने गये थे। उसके पेंतीस साल बाद माकपा के नीसान पर सीकर से कामरेड अमरा राम दुसरे सांसद बने है।
राजस्थान के श्रीगंगानगर, चूरु, झूंझुनू, दौसा, भरतपुर, करोली, टोंक-सवाईमाधोपुर, व बाडमेर से कांग्रेस के नीसान पर व सीकर से माकपा, नागौर से रालोपा एवं बांसवाड़ा से बाप पार्टी के नीसान पर जीतने वाले कुल ग्यारह इण्डिया गठबंधन के जीते हैं। इण्डिया गठबंधन के जीते ग्यारह सांसद में से पांच जाट है। जिनमें राहुल कस्वां, विजेंद्र ओला, कामरेड अमरा राम, हनुमान बेनीवाल व उम्मेदा राम शामिल है।
हालांकि कांग्रेस के खाते सीज होने के बावजूद व इण्डिया गठबंधन ने चुनाव ठीक से लड़ा। जनता ने भाजपा के खिलाफ जमकर चुनाव लड़ा। किसान आंदोलन, बेरोजगारी, महंगाई व अग्निवीर जैसे कुछ मुद्दे भाजपा के खिलाफ गये।
कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान की कृषि आधारित जातियां, एससी एसटी व मुस्लिम बिरादरियों के इण्डिया गठबंधन के पक्ष में खड़े होने से राजस्थान में अच्छा चुनाव हुआ। जिससे ग्यारह सीटें तो जीती व कुछ सीटे बहुत कम मतों से हारी।
इस चुनाव में गहलोत के पूत्र वैभव सहित उनके द्वारा दिलाई गई टिकट पर उम्मीदवार जीत नहीं पाये जबकि सचिन पायलट द्वारा दिलाई गई टिकटों पर अधीकांश उम्मीदवार चुनाव जीत गये। इससे दोनों नेताओं की राजनीति पर प्रतिकूल व अनुकूल प्रभाव पड़ेगा।
